📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / NASA/JPL-Caltech
नौकरी
रॉकेट निर्माण के निजीकरण को लेकर इसरो कर्मचारियों ने उठाया सवाल
✍️ Amar Ujala
🗓 06 सित. 2026, 09:37 AM
👁 28
हजारों इसरो कर्मचारियों ने रॉकेट निर्माण में निजी कंपनियों की भागीदारी को लेकर इसरो प्रमुख को पत्र लिखा, नौकरी के खतरे को लेकर चिंता जताई।
एक समूह इसरो कर्मचारियों ने इसरो के अध्यक्ष को औपचारिक पत्र लिखा, जिसमें रॉकेट निर्माण में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को लेकर सवाल उठाए गए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि निजीकरण के इस कदम से हजारों कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, जो दशकों से इस अंतरिक्ष कार्यक्रम का हिस्सा रहे हैं।
कर्मचारी संघों के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में इसरो प्रमुख से स्पष्ट जवाब मांगा गया है कि क्या निजी कंपनियों को रॉकेट के डिजाइन, निर्माण या लॉन्च की अनुमति दी जाएगी, जो पहले पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में था। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि यह परिवर्तन पारदर्शी नहीं रहा तो बड़े पैमाने पर छंटनी और मनोबल में गिरावट हो सकती है।
इसरो ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि, एजेंसी ने पहले "आत्मनिर्भर भारत" पहल के तहत निजी खिलाड़ियों के साथ सहयोग की इच्छा जताई थी, जिससे स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ावा मिले और व्यावसायिक विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके। कर्मचारियों की इस पहल से यह स्पष्ट होता है कि इस नीति परिवर्तन में सामाजिक पहलू को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है ताकि लॉन्च क्षमताओं में तेजी लाई जा सके। फिर भी, इसरो कर्मचारियों द्वारा उठाए गए सवाल इस नीति के सामाजिक प्रभाव को उजागर करते हैं, जो तकनीकी लक्ष्यों के साथ-साथ मानव संसाधन के भविष्य को भी प्रभावित करेंगे।
एजेंसी की ओर से इस पत्र का जवाब आने की प्रतीक्षा है, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में सार्वजनिक‑निजी साझेदारी के ढांचे को निर्धारित कर सकता है।
कर्मचारी संघों के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में इसरो प्रमुख से स्पष्ट जवाब मांगा गया है कि क्या निजी कंपनियों को रॉकेट के डिजाइन, निर्माण या लॉन्च की अनुमति दी जाएगी, जो पहले पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में था। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि यह परिवर्तन पारदर्शी नहीं रहा तो बड़े पैमाने पर छंटनी और मनोबल में गिरावट हो सकती है।
इसरो ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि, एजेंसी ने पहले "आत्मनिर्भर भारत" पहल के तहत निजी खिलाड़ियों के साथ सहयोग की इच्छा जताई थी, जिससे स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ावा मिले और व्यावसायिक विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके। कर्मचारियों की इस पहल से यह स्पष्ट होता है कि इस नीति परिवर्तन में सामाजिक पहलू को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है ताकि लॉन्च क्षमताओं में तेजी लाई जा सके। फिर भी, इसरो कर्मचारियों द्वारा उठाए गए सवाल इस नीति के सामाजिक प्रभाव को उजागर करते हैं, जो तकनीकी लक्ष्यों के साथ-साथ मानव संसाधन के भविष्य को भी प्रभावित करेंगे।
एजेंसी की ओर से इस पत्र का जवाब आने की प्रतीक्षा है, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में सार्वजनिक‑निजी साझेदारी के ढांचे को निर्धारित कर सकता है।