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23 Oct 2026•
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वाराणसी में 484 साल पुरानी भरत मिलाप की लीला, काशी नरेश ने फिर निभाई अहम भूमिका

✍️ Reporter: Kailash Chandra Gupta 🗓 22 Oct 2026, 11:35 PM 👁 16
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काशी के नाटी इमली में इस वर्ष भी भरत मिलाप की लीला में लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। 484 साल पुरानी इस परंपरा में काशी नरेश की राजकीय उपस्थिति और 5 टन वजनी पुष्पक विमान की प्रदर्शनी ने नजारे को और भी अद्भुत बना दिया।

वाराणसी। काशी के विश्वप्रसिद्ध नाटी इमली में इस वर्ष भी भरत मिलाप की लीला के दौरान लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। शाम को ठीक 4:40 बजे, जब अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें मैदान पर पड़ीं, तभी चारों भाइयों—राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भावुक मिलन हुआ। इस दृश्य के साथ पूरा मैदान 'हर-हर महादेव' और 'सियावर रामचंद्र की जय' के नारे से गूंज उठा।

इस पवित्र लीला की शुरुआत करीब 484 साल पहले संत मेधा भगत ने की थी। मान्यता है कि सरयू नदी के किनारे स्वप्न में भगवान राम ने उन्हें काशी में भरत मिलाप कराने का आशीर्वाद दिया था, जिसके बाद यह परंपरा आज तक चली आ रही है।

इस आयोजन में काशी नरेश की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है, जो कि 228 साल पुरानी परंपरा है। सन 1796 में काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने पहली बार इसमें भाग लिया था और तब से अब तक उनकी पांच पीढ़ियां इसमें शामिल होती आ रही हैं। काशी में भगवान शिव के प्रतिनिधि माने जाने वाले काशी नरेश, पूरे राजकीय ठाट-बाट, हाथियों, घोड़ों और पारंपरिक व्यवस्था के साथ विशेष मचान पर बैठकर भरत मिलाप के प्रत्यक्षदर्शी बनते हैं। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान शिव अपनी नगरी में विष्णु के अवतार श्रीराम का स्वागत कर रहे हों। आयोजन के समापन पर काशी नरेश राजसी आरती कर स्वरूपों को स्वर्ण मुद्रा प्रदान करते हैं।

लीला के दौरान एक और अद्भुत नजारा भी देखने को मिला, जब भगवान राम-लक्ष्मण के 5 टन वजनी विशाल पुष्पक विमान को यादव समुदाय के लोगों ने परंपरागत वेश में कंधों पर उठाकर अयोध्या महल बड़ा गणेश तक पहुंचाया।
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