📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / RaiyaniM
जीवनशैली
बिहार के मढ़ौरा में दशहरा मेले से पहले बांसुरी बनाने की पुश्तैनी कला जीवित
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 08 अक्टू. 2026, 08:36 PM
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सारण के मढ़ौरा में कारीगर दशहरा मेले के लिए बांसुरी बनाते हुए अपनी पुश्तैनी कला को जीवित रख रहे हैं।
बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा प्रखंड में बांसुरी बनाने की पुश्तैनी कला आज भी जीवित है, जिसे कई पीढ़ियों से परिवारों में सिखाया जाता रहा है। कारीगर स्थानीय कार्यशालाओं में परिपक्व बांस चुनते हैं और पारंपरिक औज़ारों से उसे नक्काशी करके मधुर ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्य यंत्र में बदलते हैं।
दशहरा मेले की तैयारी के दौरान ये कारीगर बांसुरियों को बड़े उत्साह से तैयार कर रहे हैं। यह वार्षिक मेले का मंच बांसुरी निर्माताओं को अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने और व्यापक दर्शकों व संगीत प्रेमियों तक पहुँचाने का मुख्य अवसर प्रदान करता है।
इस शिल्प की निरंतरता स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। बुजुर्ग कारीगर युवा पीढ़ी को बांसुरी की नक्काशी, स्वर समायोजन और सजावट की बारीकियों में प्रशिक्षित करते हैं, जिससे यह परम्परा समाप्त न हो।
हस्तशिल्प की यह परम्परा न केवल सांस्कृतिक मूल्य रखती है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी योगदान देती है, जिससे कारीगरों के परिवारों को अतिरिक्त आय मिलती है और पर्यटकों को प्रामाणिक लोक कला का अनुभव मिलता है।
दशहरा मेले की तैयारी के दौरान ये कारीगर बांसुरियों को बड़े उत्साह से तैयार कर रहे हैं। यह वार्षिक मेले का मंच बांसुरी निर्माताओं को अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने और व्यापक दर्शकों व संगीत प्रेमियों तक पहुँचाने का मुख्य अवसर प्रदान करता है।
इस शिल्प की निरंतरता स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। बुजुर्ग कारीगर युवा पीढ़ी को बांसुरी की नक्काशी, स्वर समायोजन और सजावट की बारीकियों में प्रशिक्षित करते हैं, जिससे यह परम्परा समाप्त न हो।
हस्तशिल्प की यह परम्परा न केवल सांस्कृतिक मूल्य रखती है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी योगदान देती है, जिससे कारीगरों के परिवारों को अतिरिक्त आय मिलती है और पर्यटकों को प्रामाणिक लोक कला का अनुभव मिलता है।