📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Bollywood Hungama
धर्म
संदीप भुटोरिया लाए बंगाल की महालया ‘महिषासुर मर्दिनी की गाथा’ हिंदी में
✍️ Business Standard
🗓 15 अक्टू. 2026, 06:46 AM
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प्रसिद्ध प्रसारक संदीप भुटोरिया ने बंगाल के प्रसिद्ध महालया कार्यक्रम का हिंदी संस्करण ‘महिषासुर मर्दिनी की गाथा’ पूरे भारत में प्रस्तुत किया है।
संदीप भुटोरिया, भारतीय मीडिया के एक प्रमुख व्यक्तित्व, ने पारम्परिक बंगाली महालया कार्यक्रम का हिंदी संस्करण लॉन्च करने की घोषणा की है। इस कार्यक्रम को ‘महिषासुर मर्दिनी की गाथा’ नाम दिया गया है, जिसका उद्देश्य माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा को पूरे देश के श्रोताओं तक पहुँचाना है।
मूल महालया, जो हर साल दुर्गा पूजा से पहले कोलकाता से प्रसारित होता है, भजन, श्लोक और कथा का मिश्रण है। इसे हिंदी में अनुवादित करके भुटोरिया का लक्ष्य इस आध्यात्मिक प्री‑फेस्टिवल को गैर‑बंगाली दर्शकों तक पहुँचाना है, जिससे वे भी इस सांस्कृतिक धरोहर का आनंद ले सकें।
बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, यह हिंदी संस्करण राष्ट्रीय चैनलों पर टेलीविजन के साथ‑साथ ऑनलाइन भी प्रसारित होगा, और पारम्परिक महालया के समय के साथ समन्वित रहेगा। आयोजकों ने कहा है कि सामग्री मूल रचना के प्रति सच्ची रहेगी, जबकि इसे भारत की अधिकांश जनसंख्या द्वारा समझी जाने वाली भाषा में प्रस्तुत किया जाएगा।
सांस्कृतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल क्षेत्रीय परम्पराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाकर आपसी समझ और एकता को बढ़ावा देती है, जिससे स्थानीय परम्पराएँ बिना किसी परिवर्तन के व्यापक दर्शकों तक पहुँच सकें।
मूल महालया, जो हर साल दुर्गा पूजा से पहले कोलकाता से प्रसारित होता है, भजन, श्लोक और कथा का मिश्रण है। इसे हिंदी में अनुवादित करके भुटोरिया का लक्ष्य इस आध्यात्मिक प्री‑फेस्टिवल को गैर‑बंगाली दर्शकों तक पहुँचाना है, जिससे वे भी इस सांस्कृतिक धरोहर का आनंद ले सकें।
बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, यह हिंदी संस्करण राष्ट्रीय चैनलों पर टेलीविजन के साथ‑साथ ऑनलाइन भी प्रसारित होगा, और पारम्परिक महालया के समय के साथ समन्वित रहेगा। आयोजकों ने कहा है कि सामग्री मूल रचना के प्रति सच्ची रहेगी, जबकि इसे भारत की अधिकांश जनसंख्या द्वारा समझी जाने वाली भाषा में प्रस्तुत किया जाएगा।
सांस्कृतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल क्षेत्रीय परम्पराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाकर आपसी समझ और एकता को बढ़ावा देती है, जिससे स्थानीय परम्पराएँ बिना किसी परिवर्तन के व्यापक दर्शकों तक पहुँच सकें।