📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Bollywood Hungama
विदेश
सीहोर के समाजसेवी ने 1917 के 35,000 रुपये के ब्रिटिश ऋण का दावा, यूके डेट ऑफिस ने रिकॉर्ड नहीं पाया
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 18 अक्टू. 2026, 08:31 PM
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सीहोर के विनय रूथिया ने कहा कि उनके पूर्वज सेठ जुम्मा लाल रूथिया ने 1917 में ब्रिटिश सरकार को 35,000 रुपये का ऋण दिया था, पर यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस ने कोई रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात कही है।
सीहोर, मध्य प्रदेश – स्थानीय समाजसेवी विनय रूथिया ने कहा कि उनके पूर्वज, शुरुआती 20वीं सदी के व्यापारी सेठ जुम्मा लाल रूथिया ने 1917 में ब्रिटिश सरकार को 35,000 रुपये का ऋण दिया था। यह राशि, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के खर्च को समर्थन देने के लिए दी गई थी, आज के मूल्य में कई करोड़ रुपये के बराबर है।
रूथिया ने इस दावे को आधिकारिक रूप से ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष पेश किया है, जिसमें वह ऋण की औपचारिक मान्यता और संभवतः पुनर्भुगतान या मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह लेन‑देन पारिवारिक खाता‑बही में दर्ज है, पर भारत की स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश सरकार ने इसे नहीं चुकाया।
यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस, जो ऐतिहासिक सरकारी ऋणों की देखरेख करता है, ने कहा कि उसके अभिलेखों में इस प्रकार के किसी ऋण का कोई प्रमाण नहीं मिला। दस्तावेज़ी साक्ष्य के अभाव में वह इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकता।
क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एक सदी‑पुराने निजी ऋण को पूर्व उपनिवेशी शक्ति के विरुद्ध सिद्ध करना अत्यंत कठिन है, विशेषकर जब आधिकारिक अभिलेखों में समर्थन नहीं मिलता। रूथिया के इस कदम ने स्थानीय मीडिया और समुदाय के समूहों का ध्यान आकर्षित किया है, जो इसे ऐतिहासिक आर्थिक अन्याय के खिलाफ एक प्रतीकात्मक संघर्ष मानते हैं।
अभी तक इस मामले का कोई समाधान नहीं निकला है, और रूथिया ने कहा कि यदि नई साक्ष्य उपलब्ध होते हैं तो वह कूटनीतिक या कानूनी मार्गों से आगे बढ़ने पर विचार करेंगे।
रूथिया ने इस दावे को आधिकारिक रूप से ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष पेश किया है, जिसमें वह ऋण की औपचारिक मान्यता और संभवतः पुनर्भुगतान या मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह लेन‑देन पारिवारिक खाता‑बही में दर्ज है, पर भारत की स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश सरकार ने इसे नहीं चुकाया।
यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस, जो ऐतिहासिक सरकारी ऋणों की देखरेख करता है, ने कहा कि उसके अभिलेखों में इस प्रकार के किसी ऋण का कोई प्रमाण नहीं मिला। दस्तावेज़ी साक्ष्य के अभाव में वह इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकता।
क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एक सदी‑पुराने निजी ऋण को पूर्व उपनिवेशी शक्ति के विरुद्ध सिद्ध करना अत्यंत कठिन है, विशेषकर जब आधिकारिक अभिलेखों में समर्थन नहीं मिलता। रूथिया के इस कदम ने स्थानीय मीडिया और समुदाय के समूहों का ध्यान आकर्षित किया है, जो इसे ऐतिहासिक आर्थिक अन्याय के खिलाफ एक प्रतीकात्मक संघर्ष मानते हैं।
अभी तक इस मामले का कोई समाधान नहीं निकला है, और रूथिया ने कहा कि यदि नई साक्ष्य उपलब्ध होते हैं तो वह कूटनीतिक या कानूनी मार्गों से आगे बढ़ने पर विचार करेंगे।