Religion
समस्तीपुर: अनोखे सती स्थान मंदिर में समाधि की होती है पूजा, 600 साल पुरानी है परंपरा
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बिहार के समस्तीपुर जिले में एक ऐसा अनोखा मंदिर है जहाँ मां दुर्गा की नहीं, बल्कि सती के समाधि स्थल की पूजा की जाती है। यह परंपरा करीब छह सौ साल पुरानी है और दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ मन्नतें लेकर आते हैं।
समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर प्रखंड में स्थित सती स्थान मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहाँ मां दुर्गा की मूर्ति की पूजा के बजाय, मां सती के समाधि स्थल की पूजा की जाती है। इस स्थान से जुड़ी करीब छह सौ साल पुरानी लोककथा और आस्था की परंपरा इसे विशेष बनाती है। मां सती के दर्शन और मन्नत मांगने के लिए दूर-दराज के इलाकों के साथ-साथ नेपाल से भी श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं।
मां सती स्थान का इतिहास वर्ष 1430 ईस्वी से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, अगहन शुक्ल सप्तमी मंगलवार को गांव निवासी गतिराम सिंह की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी चंद्रावती ने स्थानीय लोगों के मना करने के बावजूद भी पति की चिता के साथ समाधि ले ली। बताया जाता है कि उन्होंने सोलह श्रृंगार कर गांव की बहू-बेटियों को आशीर्वाद दिया और फिर चिता पर चली गईं।
लोगों के बीच प्रचलित इस कथा ने कालांतर में इस स्थल को विशेष धार्मिक पहचान दी। इसी कारण इस गांव का दूसरा नाम गतिरामनगर भी कहा गया। मां सती के समाधि स्थल को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। लोगों का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है।
इसी विश्वास के साथ महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग समाधि स्थल पर पहुंचकर परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। यह मंदिर क्षेत्र की आस्था और परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
मां सती स्थान का इतिहास वर्ष 1430 ईस्वी से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, अगहन शुक्ल सप्तमी मंगलवार को गांव निवासी गतिराम सिंह की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी चंद्रावती ने स्थानीय लोगों के मना करने के बावजूद भी पति की चिता के साथ समाधि ले ली। बताया जाता है कि उन्होंने सोलह श्रृंगार कर गांव की बहू-बेटियों को आशीर्वाद दिया और फिर चिता पर चली गईं।
लोगों के बीच प्रचलित इस कथा ने कालांतर में इस स्थल को विशेष धार्मिक पहचान दी। इसी कारण इस गांव का दूसरा नाम गतिरामनगर भी कहा गया। मां सती के समाधि स्थल को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। लोगों का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है।
इसी विश्वास के साथ महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग समाधि स्थल पर पहुंचकर परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। यह मंदिर क्षेत्र की आस्था और परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।