🔥 ट्रेंडिंग भोपाल मास्टर प्लान-2047 पर कांग्रेस ने... बिहार को औद्योगिक विकास और निवेश के क्... इंदौर में 800 बस्तियों में निकला RSS क... बीना स्टेशन में बदलाव से चार मेमू ट्रे... पटना में बिहार गौरव सम्मान समारोह, कृष... छत्रपती संभाजीनगर में 23 बिल्डरों पर अ...
25 अक्टू. 2026•
ગુજરાતી मराठी ਪੰਜਾਬੀ বাংলা

RSS के रूट मार्च की अनुमति के लिए मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा? जानिए पूरा मामला

✍️ रिपोर्टर: Ratneshwar Chandrakant Jha 🗓 25 अक्टू. 2026, 03:14 PM 👁 14
शेयर करें: 💬 WhatsApp 📘 Facebook 𝕏 Post

RSS के रूट मार्च की अनुमति के लिए मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा? जानिए पूरा मामला

RSS के रूट मार्च की अनुमति के लिए मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा? जानिए पूरा मामला

तमिलनाडु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूट मार्च को लेकर उठा विवाद एक बार फिर अदालत तक पहुंच गया। यह विवाद केवल जुलूस निकालने की अनुमति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके केंद्र में संगठन के सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने के अधिकार और पुलिस की कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारियों का सवाल भी था।

अनुमति को लेकर कहां से शुरू हुआ विवाद?

मामले के अनुसार, RSS ने तमिलनाडु में अपने स्थापना दिवस और विजयादशमी से जुड़े कार्यक्रमों के तहत राज्य के 128 स्थानों पर रूट मार्च तथा सार्वजनिक सभाएं आयोजित करने की योजना बनाई थी। इसके लिए RSS के उत्तर तमिलनाडु के राज्य सचिव वी. जी. जगदीशन ने 3 अक्टूबर 2026 को पुलिस महानिदेशक (DGP) को आवेदन देकर आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की थी।

संगठन चाहता था कि विभिन्न जिलों के पुलिस आयुक्त और पुलिस अधीक्षक निर्धारित कार्यक्रमों के लिए अनुमति दें। प्रस्तावित कार्यक्रमों में गणवेशधारी स्वयंसेवकों का मार्च, संगीत बैंड और उसके बाद सार्वजनिक सभा शामिल थी।

हालांकि, अनुमति की प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन सकी। RSS का पक्ष था कि शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकालने के लिए उसे बार-बार अदालत का रुख नहीं करना चाहिए। इसके बाद संगठन ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।

पुलिस ने अनुमति देने में क्या आपत्तियां उठाईं?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर मार्च की अनुमति देने को लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई थीं। इनमें प्रस्तावित रास्तों पर अन्य समुदायों के धार्मिक स्थल होना, यातायात बाधित होने की संभावना, कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का अंदेशा, सुरक्षा बलों की तैनाती और कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों की संख्या से जुड़ी जानकारी जैसे मुद्दे शामिल थे।

कुछ स्थानों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, रास्ते में प्रतिमाओं की मौजूदगी और अलग विचारधारा वाले संगठनों की संभावित गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया था।

प्रशासन का पक्ष था कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान शांति बनाए रखना और किसी भी अप्रिय स्थिति को रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है। वहीं, RSS ने अनुमति रोकने के इन आधारों पर आपत्ति जताई और न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की।

यहां ध्यान देना जरूरी है कि पुलिस की आशंकाओं को किसी वास्तविक हिंसक घटना का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उसी तरह, RSS की ओर से अनुमति मांगे जाने मात्र से यह निष्कर्ष भी नहीं निकलता कि हर स्थान पर किसी तरह का जोखिम नहीं था। इन्हीं परिस्थितियों में अनुमति देने की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार पर न्यायिक समीक्षा हुई।

हाई कोर्ट ने पुलिस के तर्कों पर सवाल क्यों उठाए?

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने इस बात पर सवाल उठाया कि जब पूर्व में अदालतें इसी तरह के कारणों पर विचार कर चुकी हैं, तो अनुमति रोकने के लिए बार-बार उन्हीं आधारों का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि किसी मार्ग पर मस्जिद या चर्च की मौजूदगी को अपने-आप में जुलूस की अनुमति अस्वीकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह, केवल यातायात की समस्या या अलग विचारधारा वाले संगठनों की मौजूदगी का उल्लेख करके अनुमति रोकना उचित नहीं होगा, यदि उसके समर्थन में परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त आधार न हों।

अदालत की चिंता यह भी थी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरोध की आशंका का हवाला देते समय यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस आशंका का वास्तविक आधार क्या है। किसी पूरे समुदाय को संभावित विरोध से जोड़कर देखना उचित नहीं है।
📲Get App