स्थानीय
पाकुड़ में टेंडर प्रक्रिया पर सवाल: छोटे ठेकेदारों को मौका देने की मांग उठी
पाकुड़ में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल की टेंडर प्रक्रिया को लेकर छोटे ठेकेदारों ने सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि छोटे विकास कार्यों को अलग-अलग टेंडर में शामिल कर उन्हें भी मौका दिया जाए।
पाकुड़ में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल की टेंडर प्रक्रिया को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। छोटे ठेकेदारों ने मांग की है कि छोटे-छोटे विकास कार्यों को अलग-अलग टेंडर के माध्यम से स्थानीय छोटे ठेकेदारों को भी मौका दिया जाना चाहिए, अन्यथा इन कार्यों को बड़े समूहों में रखे जाने से छोटे ठेकेदार पीछे छूट रहे हैं।
ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, पाकुड़ द्वारा जारी आरडीएसपीएल/पाकुड़/04/2026-27, सेकंड कॉल की निविदा सूचना में 25 योजनाओं को तीन समूहों में बांटा गया है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इन समूहों की प्रशासनिक स्वीकृति राशि क्रमशः लगभग 50.26 लाख, 83.77 लाख और 75.39 लाख रुपये है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जब कई योजनाओं की लागत लगभग 8.38 लाख रुपये के आसपास है, तो क्या छोटे ठेकेदारों को अलग-अलग कामों में भाग लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलना चाहिए?
छोटे ठेकेदारों का कहना है कि यदि योजनाओं को उनकी पात्रता और नियमों के अनुसार अलग-अलग निविदाओं में अवसर दिया जाए, तो अधिक लोगों को काम मिल सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। वहीं, टेंडर को तीन समूहों में रखने के पीछे विभाग की क्या मंशा है, क्या इसकी शर्तें छोटे ठेकेदारों की भागीदारी को सीमित करती हैं, और क्या प्रक्रिया में किसी नियम का उल्लंघन हुआ है—इन सवालों पर विभाग का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, पाकुड़ के अधिकारी इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या छोटे ठेकेदारों की चिंताओं पर कोई कार्रवाई की जाती है। यह मामला जांच और विभागीय स्पष्टीकरण का विषय है, जिसमें टेंडर में अनियमितता या घोटाले की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, निविदा शर्तों और आधिकारिक जवाब के आधार पर ही की जा सकती है।
ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, पाकुड़ द्वारा जारी आरडीएसपीएल/पाकुड़/04/2026-27, सेकंड कॉल की निविदा सूचना में 25 योजनाओं को तीन समूहों में बांटा गया है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इन समूहों की प्रशासनिक स्वीकृति राशि क्रमशः लगभग 50.26 लाख, 83.77 लाख और 75.39 लाख रुपये है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जब कई योजनाओं की लागत लगभग 8.38 लाख रुपये के आसपास है, तो क्या छोटे ठेकेदारों को अलग-अलग कामों में भाग लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलना चाहिए?
छोटे ठेकेदारों का कहना है कि यदि योजनाओं को उनकी पात्रता और नियमों के अनुसार अलग-अलग निविदाओं में अवसर दिया जाए, तो अधिक लोगों को काम मिल सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। वहीं, टेंडर को तीन समूहों में रखने के पीछे विभाग की क्या मंशा है, क्या इसकी शर्तें छोटे ठेकेदारों की भागीदारी को सीमित करती हैं, और क्या प्रक्रिया में किसी नियम का उल्लंघन हुआ है—इन सवालों पर विभाग का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, पाकुड़ के अधिकारी इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या छोटे ठेकेदारों की चिंताओं पर कोई कार्रवाई की जाती है। यह मामला जांच और विभागीय स्पष्टीकरण का विषय है, जिसमें टेंडर में अनियमितता या घोटाले की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, निविदा शर्तों और आधिकारिक जवाब के आधार पर ही की जा सकती है।