📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / National Law Forum, L.L.C
अपराध
एनएलआईयू शोध: कड़ी सजा के बावजूद दुष्कर्म में 154 दोषियों ने नाबालिगों को निशाना बनाया
✍️ Amar Ujala · Bhopal
🗓 31 अक्टू. 2026, 05:33 PM
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एनएलआईयू के छह साल के अध्ययन में एमपी के जेलों में बंद 300 दुष्कर्मियों से पता चला कि फांसी या उम्रकैद जैसी कड़ी सजा ने उनके सोच में बदलाव नहीं किया, 154 ने नाबालिगों को लक्ष्य बनाया।
भोपाल स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलआईयू) ने छह साल की शोध परियोजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश के जेलों में बंद 300 दुष्कर्मियों से साक्षात्कार किया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह देखना था कि फांसी और उम्रकैद जैसी कड़ी सजा के प्रावधान अपराधियों के रवैये को बदलते हैं या नहीं।
परिणामों से स्पष्ट हुआ कि कठोर दंड ने कई अपराधियों के सोच में कोई बदलाव नहीं लाया। सर्वेक्षण में 300 में से 154 ने स्वीकार किया कि उनके पीड़ित नाबालिग थे, जिससे यह पता चलता है कि बच्चों को निशाना बनाना अभी भी आम है, जबकि कड़ी सजा मौजूद है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल दंड के माध्यम से रोकथाम पर्याप्त नहीं है। वे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को संबोधित करने वाली व्यापक रणनीतियों की आवश्यकता पर बल देते हैं, जैसे प्रारंभिक हस्तक्षेप, जागरूकता कार्यक्रम और जेलों में पुनर्वास पहल।
यह अध्ययन नीति निर्माताओं से अनुरोध करता है कि कड़े कानूनों के साथ-साथ रोकथाम और पुनर्वास उपायों को भी सुदृढ़ किया जाए, ताकि राज्य में विशेषकर बच्चों के खिलाफ दुष्कर्म की घटनाओं को घटाया जा सके।
परिणामों से स्पष्ट हुआ कि कठोर दंड ने कई अपराधियों के सोच में कोई बदलाव नहीं लाया। सर्वेक्षण में 300 में से 154 ने स्वीकार किया कि उनके पीड़ित नाबालिग थे, जिससे यह पता चलता है कि बच्चों को निशाना बनाना अभी भी आम है, जबकि कड़ी सजा मौजूद है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल दंड के माध्यम से रोकथाम पर्याप्त नहीं है। वे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को संबोधित करने वाली व्यापक रणनीतियों की आवश्यकता पर बल देते हैं, जैसे प्रारंभिक हस्तक्षेप, जागरूकता कार्यक्रम और जेलों में पुनर्वास पहल।
यह अध्ययन नीति निर्माताओं से अनुरोध करता है कि कड़े कानूनों के साथ-साथ रोकथाम और पुनर्वास उपायों को भी सुदृढ़ किया जाए, ताकि राज्य में विशेषकर बच्चों के खिलाफ दुष्कर्म की घटनाओं को घटाया जा सके।