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11 Oct 2026•
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मसिंहासन और साधना का संगम: जब सियासत के धुरंधर बन गए मां त्रिपुरा सुंदरी के मुरीद

✍️ Reporter: Subhash Mehta 🗓 11 Oct 2026, 01:06 PM 👁 17
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धरा पर एक ऐसा कोना है जहां राजनीति के रणबांकरे अपनी चालें चलने से पहले शीश झुकाने आते हैं। दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा की उपजाऊ और लोक-संस्कृति से सराबोर माटी में विराजमान माता त्रिपुरा सुंदरी, जिन्हें वागड़ आंचल में 'तरतई माता' यानी तुरंत फल देने वाली देवी कहा जाता है, आज देश के राजनीतिक गलियारों का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और गुप्त केंद्र बन चुकी हैं।
यह कोई आम मंदिर की कहानी नहीं है, बल्कि यह सत्ता, साधना और समर्पण की वह अनकही पटकथा है, जिसके पन्ने इतिहास के कोहरे से लेकर आज की वीवीआईपी सूचियों तक गवाही देते हैं।
वागड़ की इस पावन धरा पर आदिकाल से स्थानीय लोक-आस्था की बयार बहती रही है, लेकिन इस शक्तिपीठ के राष्ट्रीय फलक पर चमकने की कहानी बेहद दिलचस्प है। राजस्थान की राजनीति के पुरोधा और तीन बार राज्य की कमान संभालने वाले हरिदेव जोशी इस दरबार के अनन्य और परम भक्त माने जाते थे।
साल 2004 में जैसे ही वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, इस मंदिर की ख्याति ने राजस्थान की सीमाओं को लांघ दिया। इसके बाद तो यहां आने वाले दिग्गजों का तांता ही लग गया। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल तक, और देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, कैबिनेट मंत्रियों से लेकर न्यायपालिका के शीर्ष न्यायाधीशों तक—हर किसी ने इस राजराजेश्वरी के चरणों में अपनी राजनीतिक सफलता की अरदास लगाई है। यहां आने वाले हर बड़े चेहरे की जुबान पर एक ही बात होती है— "जो माता के दरबार में झुका, उसका मुकद्दर बुलंद हुआ।"
मंदिर के निर्माण को लेकर पुख्ता ऐतिहासिक दस्तावेज या काल-निर्धारण के सरकारी पन्ने भले ही आज धूल में दबे हों, लेकिन इसके इतिहास की जड़ें बहुत गहरी हैं। मंदिर परिसर से प्राप्त विक्रम संवत 1540 (1483 ईस्वी) का एक प्राचीन शिलालेख इस बात का गवाह है कि यह स्थान सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार यह मानते हैं कि इस शिलालेख से भी बहुत पहले, यानी सम्राट कनिष्क के काल से भी पूर्व यह क्षेत्र गुप्त साधना और तांत्रिक अराधना का एक मुख्य केंद्र रहा होगा। बांसवाड़ा शहर से करीब 16 किलोमीटर दूर स्थित इस महाशक्ति को 'राजराजेश्वरी' यानी राजाओं की भी आराध्य देवी यूं ही नहीं कहा जाता।
मां त्रिपुरा सुंदरी का दरबार सालभर धार्मिक अनुष्ठानों और मेलों से गूंजता रहता है। चैत्र नवरात्रि की अष्टमी के दिन यहां भव्य महायज्ञ और विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। अश्विन नवरात्रि के नौ दिनों तक चलने वाले इन पावन दिनों में नित्य चंडी पाठ, गरबा, अष्टमी हवन और मेले की धूम पूरे वागड़ को भक्तिमय बना देती है। इसी तरह कार्तिक पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष अष्टमी के खास मौकों पर मां का प्राकट्य उत्सव, महाहवन, और रात्रि के समय गूंजने वाले भजन व गरबा कार्यक्रम इस धाम की रौनक में चार चांद लगा देते हैं।
> एक अनसुलझा सवाल:
> जब देश की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकतें और रणनीतिकार अपने हर बड़े कदम से पहले बांसवाड़ा के इस एकांत और जादुई प्रांगण में माथा टेकने आते हैं, तो क्या यह माना जाए कि लोकतंत्र के सिंहासन की असली चाबी संसद के गलियारों में नहीं, बल्कि इन प्राचीन सिद्धपीठों के गुप्त अनुष्ठानों में छिपी है?
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