📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Dudley Miles
कृषि
मध्य प्रदेश में 354 फसल‑आग, पंजाब पर 220 के साथ दूसरे स्थान पर
✍️ Hindustan Times
🗓 19 अक्टू. 2026, 08:32 AM
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मध्य प्रदेश ने 354 फसल‑आग घटनाओं के साथ सूची में पहला स्थान हासिल किया, जबकि पंजाब ने 220 घटनाओं की रिपोर्ट की।
राज्य सरकारों और कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 354 फसल‑आग घटनाएँ दर्ज हुईं, जो सभी भारतीय राज्यों में सबसे अधिक हैं। पंजाब ने 220 घटनाओं के साथ दूसरा स्थान हासिल किया, जिससे इस मौसम में कृषि जलाने की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।
यह आँकड़े राज्य वन विभागों के सहयोग से संकलित किए गए हैं और दर्शाते हैं कि फसल कटाई के बाद खेतों में खुले में जलाने की प्रक्रिया बढ़ी है, जिससे वायु गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और आस‑पास के निवासियों को जोखिम होता है।
मध्य प्रदेश की अधिकारियों ने निगरानी को कड़ा करने और पारंपरिक जलाने के विकल्प प्रदान करने की योजना घोषित की है, जिसमें अवशेष प्रबंधन के लिए सब्सिडी वाले उपकरण शामिल हैं। पंजाब में भी समान उपायों पर चर्चा चल रही है ताकि इस प्रथा को कम किया जा सके और पर्यावरणीय प्रभाव को घटाया जा सके।
पर्यावरण संगठनों ने इन उपायों के शीघ्र कार्यान्वयन की मांग की है, क्योंकि बार‑बार होने वाली आगें मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और क्षेत्रीय धुंध को प्रभावित करती हैं। आने वाले मानसून के साथ ऐसी घटनाओं की आवृत्ति बदल सकती है, इसलिए राज्य एजेंसियों और किसानों को सतर्क रहना आवश्यक है।
इन नवीनतम आँकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि फसल‑आग की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत उपायों के साथ संबोधित करना होगा, जिससे कृषि आवश्यकताओं और पर्यावरण एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
यह आँकड़े राज्य वन विभागों के सहयोग से संकलित किए गए हैं और दर्शाते हैं कि फसल कटाई के बाद खेतों में खुले में जलाने की प्रक्रिया बढ़ी है, जिससे वायु गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और आस‑पास के निवासियों को जोखिम होता है।
मध्य प्रदेश की अधिकारियों ने निगरानी को कड़ा करने और पारंपरिक जलाने के विकल्प प्रदान करने की योजना घोषित की है, जिसमें अवशेष प्रबंधन के लिए सब्सिडी वाले उपकरण शामिल हैं। पंजाब में भी समान उपायों पर चर्चा चल रही है ताकि इस प्रथा को कम किया जा सके और पर्यावरणीय प्रभाव को घटाया जा सके।
पर्यावरण संगठनों ने इन उपायों के शीघ्र कार्यान्वयन की मांग की है, क्योंकि बार‑बार होने वाली आगें मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और क्षेत्रीय धुंध को प्रभावित करती हैं। आने वाले मानसून के साथ ऐसी घटनाओं की आवृत्ति बदल सकती है, इसलिए राज्य एजेंसियों और किसानों को सतर्क रहना आवश्यक है।
इन नवीनतम आँकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि फसल‑आग की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत उपायों के साथ संबोधित करना होगा, जिससे कृषि आवश्यकताओं और पर्यावरण एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।