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राजनीति
मणिपुर में कुकि-जो समूहों ने संघ शासित प्रदेश की मांग दोहराई
✍️ India Today NE
🗓 11 सित. 2026, 12:18 AM
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मणिपुर के कुकि-जो संगठनों ने राज्य को अपना विधान सभा वाला संघ शासित प्रदेश बनाने की मांग दोबारा दोहराई है।
मणिपुर में कुकि‑जो समुदाय के प्रतिनिधियों ने राज्य को अपना विधान सभा वाला संघ शासित प्रदेश बनाने की मांग फिर से दोहराई है। इन समूहों का कहना है कि यह कदम उनके क्षेत्र की राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं को हल करेगा। यह मांग पहले भी उठाई गई थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह मुद्दा राज्य के जातीय परिदृश्य में गहराई से जुड़ा हुआ है। अभी तक केंद्र सरकार की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है, और यह मांग स्थानीय राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बनी हुई है।
कुकि‑जो नेताओं ने बताया कि विधान सभा के साथ संघ शासित प्रदेश की स्थिति उन्हें स्थानीय शासन, संसाधन वितरण और सांस्कृतिक संरक्षण पर अधिक स्वायत्तता देगी। उनका तर्क है कि वर्तमान राज्य ढांचा कुकि‑जो क्षेत्रों की जनसंख्या और भौगोलिक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता। यह मांग सार्वजनिक बयानों और सामुदायिक बैठकों के माध्यम से उठाई गई है, जिसका उद्देश्य राज्य और राष्ट्रीय नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करना है।
हालांकि मांग दोहराई गई है, मणिपुर का व्यापक राजनीतिक माहौल जटिल बना हुआ है, जहाँ कई जातीय समूह अपनी‑अपनी आकांक्षाएँ व्यक्त कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संघ शासित प्रदेश की स्थिति में परिवर्तन के लिए संविधान में संशोधन और संसद की सहमति आवश्यक होगी, जिससे आगे का मार्ग अनिश्चित बना रहता है।
कुकि‑जो नेताओं ने बताया कि विधान सभा के साथ संघ शासित प्रदेश की स्थिति उन्हें स्थानीय शासन, संसाधन वितरण और सांस्कृतिक संरक्षण पर अधिक स्वायत्तता देगी। उनका तर्क है कि वर्तमान राज्य ढांचा कुकि‑जो क्षेत्रों की जनसंख्या और भौगोलिक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता। यह मांग सार्वजनिक बयानों और सामुदायिक बैठकों के माध्यम से उठाई गई है, जिसका उद्देश्य राज्य और राष्ट्रीय नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करना है।
हालांकि मांग दोहराई गई है, मणिपुर का व्यापक राजनीतिक माहौल जटिल बना हुआ है, जहाँ कई जातीय समूह अपनी‑अपनी आकांक्षाएँ व्यक्त कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संघ शासित प्रदेश की स्थिति में परिवर्तन के लिए संविधान में संशोधन और संसद की सहमति आवश्यक होगी, जिससे आगे का मार्ग अनिश्चित बना रहता है।