📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Augustus Binu/ www.dreamsparrow.net/ facebook
अपराध
केरल हाई कोर्ट ने 341 जमानती कैदी अभी भी हिरासत में पाए, ई‑प्रिज़न्स पोर्टल की खामियों को उजागर किया
✍️ Bar and Bench
🗓 03 सित. 2026, 02:34 AM
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केरल हाई कोर्ट ने बताया कि जमानत मिलने के बाद 341 कैदियों को सात दिन के भीतर रिहा नहीं किया गया, जिससे ई‑प्रिज़न्स प्रणाली में खामियां सामने आईं।
केरल हाई कोर्ट ने देखा कि जमानत मिलने के बाद भी 341 कैदी सात‑दिन की वैधानिक सीमा के भीतर रिहा नहीं किए गए, जिससे कानून के उल्लंघन का संकेत मिलता है। यह मुद्दा एक याचिका के बाद कोर्ट में उठाया गया, जिसमें रिहाई में देरी की शिकायत की गई थी।
कोर्ट ने इस देरी को ई‑प्रिज़न्स पोर्टल की खामियों से जोड़ा, जो जमानत के आवेदन, मंजूरी और रिहाई को ट्रैक करने के लिए बनाया गया था। पोर्टल ने समय पर अलर्ट नहीं भेजे और जेल अधिकारियों को जमानत आदेशों पर शीघ्र कार्रवाई करने में विफल रहा।
इसके बाद कोर्ट ने राज्य जेल विभाग को ई‑प्रिज़न्स प्रणाली की त्वरित ऑडिट करने, तकनीकी त्रुटियों को सुधारने और चार हफ्तों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। साथ ही, बकाया जमानती कैदियों की रिहाई को प्राथमिकता देने का आदेश दिया गया।
जेल अधिकारियों ने इन खामियों को स्वीकार किया और कोर्ट के निर्देशों के साथ सहयोग करने का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि तकनीकी अपग्रेड और स्टाफ प्रशिक्षण चल रहा है ताकि भविष्य में ऐसी देरी न हो।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में डिजिटल गवर्नेंस की महत्ता को रेखांकित करता है और अन्य राज्यों को भी अपने ई‑प्रिज़न्स सिस्टम की समीक्षा करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
कोर्ट ने इस देरी को ई‑प्रिज़न्स पोर्टल की खामियों से जोड़ा, जो जमानत के आवेदन, मंजूरी और रिहाई को ट्रैक करने के लिए बनाया गया था। पोर्टल ने समय पर अलर्ट नहीं भेजे और जेल अधिकारियों को जमानत आदेशों पर शीघ्र कार्रवाई करने में विफल रहा।
इसके बाद कोर्ट ने राज्य जेल विभाग को ई‑प्रिज़न्स प्रणाली की त्वरित ऑडिट करने, तकनीकी त्रुटियों को सुधारने और चार हफ्तों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। साथ ही, बकाया जमानती कैदियों की रिहाई को प्राथमिकता देने का आदेश दिया गया।
जेल अधिकारियों ने इन खामियों को स्वीकार किया और कोर्ट के निर्देशों के साथ सहयोग करने का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि तकनीकी अपग्रेड और स्टाफ प्रशिक्षण चल रहा है ताकि भविष्य में ऐसी देरी न हो।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में डिजिटल गवर्नेंस की महत्ता को रेखांकित करता है और अन्य राज्यों को भी अपने ई‑प्रिज़न्स सिस्टम की समीक्षा करने के लिए प्रेरित कर सकता है।