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राजनीति
केरल की संस्था केरलाम ने एनएच के निकट निर्माण प्रतिबंध को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का फैसला किया
✍️ The Hindu
🗓 20 अग. 2026, 07:41 PM
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पर्यावरण कार्यकर्ता समूह केरलाम ने केरल में राष्ट्रीय राजमार्ग के पास निर्माण पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का इरादा जताया है।
पर्यावरण कार्यकर्ता समूह केरलाम ने केरल में एक राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट निर्माण पर लगाए गए नए प्रतिबंध को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का इरादा जताया है। राज्य प्राधिकरणों ने इस प्रतिबंध को लागू किया है ताकि अनियंत्रित विकास से सड़क सुरक्षा और आसपास के पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
सूचना के अनुसार, राजमार्ग से निर्धारित दूरी के भीतर कोई भी नया निर्माण, विस्तार या संबंधित कार्य अब तक के लिए प्रतिबंधित है। अधिकारियों ने इस कदम को ट्रैफ़िक में बाधा, दुर्घटना जोखिम में वृद्धि और सड़क के किनारे के प्राकृतिक परिदृश्य को संभावित क्षति से बचाने के कारण बताया है।
केरलाम का कहना है कि यह व्यापक प्रतिबंध वैध विकास आवश्यकताओं को नजरअंदाज़ करता है और स्थानीय लोगों की आजीविका पर नकारात्मक असर डाल सकता है। समूह न्यायिक समीक्षा की मांग कर रहा है, यह तर्क देते हुए कि आदेश बिना पर्याप्त हितधारक परामर्श के जारी किया गया था और यह संपत्ति अधिकारों के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकता है।
यदि याचिका स्वीकार की जाती है, तो यह भारत के तेज़ी से विकसित होते क्षेत्रों में पर्यावरण और बुनियादी ढाँचे के हितों के संतुलन के लिए एक मिसाल स्थापित कर सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट आने वाले हफ्तों में सुनवाई निर्धारित करेगा, जिसके बाद यह मामला नागरिक समाज और निर्माण कंपनियों दोनों के लिए बारीकी से देखा जाएगा।
सूचना के अनुसार, राजमार्ग से निर्धारित दूरी के भीतर कोई भी नया निर्माण, विस्तार या संबंधित कार्य अब तक के लिए प्रतिबंधित है। अधिकारियों ने इस कदम को ट्रैफ़िक में बाधा, दुर्घटना जोखिम में वृद्धि और सड़क के किनारे के प्राकृतिक परिदृश्य को संभावित क्षति से बचाने के कारण बताया है।
केरलाम का कहना है कि यह व्यापक प्रतिबंध वैध विकास आवश्यकताओं को नजरअंदाज़ करता है और स्थानीय लोगों की आजीविका पर नकारात्मक असर डाल सकता है। समूह न्यायिक समीक्षा की मांग कर रहा है, यह तर्क देते हुए कि आदेश बिना पर्याप्त हितधारक परामर्श के जारी किया गया था और यह संपत्ति अधिकारों के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकता है।
यदि याचिका स्वीकार की जाती है, तो यह भारत के तेज़ी से विकसित होते क्षेत्रों में पर्यावरण और बुनियादी ढाँचे के हितों के संतुलन के लिए एक मिसाल स्थापित कर सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट आने वाले हफ्तों में सुनवाई निर्धारित करेगा, जिसके बाद यह मामला नागरिक समाज और निर्माण कंपनियों दोनों के लिए बारीकी से देखा जाएगा।