📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / ZohraAnjum
शिक्षा
कर्नाटक के परिवार ने 37 साल तक संस्कृत को मातृभाषा बनाया
✍️ The Times of India
🗓 06 सित. 2026, 03:34 PM
👁 28
कर्नाटक के एक घर में 37 साल से संस्कृत को दैनिक भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जो इस प्राचीन भाषा को घर में बोलने का दुर्लभ उदाहरण है।
कर्नाटक में रहने वाले एक परिवार ने पिछले 37 वर्षों से घर में संस्कृत को मुख्य भाषा के रूप में अपनाया है, जो आज के भारत में दुर्लभ है। माता‑पिता और उनके बच्चों सहित इस घर में सभी बातचीत, भोजन और सांस्कृतिक अनुष्ठान पूरी तरह से संस्कृत में होते हैं, जिससे भाषा शैक्षणिक माहौल से बाहर भी जीवित रहती है।
परिवार का कहना है कि यह कदम प्राचीन भाषा को जीवित रखने और बच्चों को सांस्कृतिक जड़ें प्रदान करने के इरादे से उठाया गया था। सभी सदस्य प्रवाहपूर्ण रूप से संस्कृत बोलते हैं, जबकि बच्चों को क्षेत्रीय भाषा और संस्कृत दोनों में शिक्षा दी गई है, जिससे वे स्कूल की पढ़ाई के साथ अपनी भाषा की परम्परा भी बनाए रखते हैं।
भाषा विशेषज्ञ बताते हैं कि घर में इतने लंबे समय तक संस्कृत का दैनिक उपयोग अत्यंत दुर्लभ है; अधिकांश पुनरुज्जीवन प्रयास स्कूलों और मंदिरों तक सीमित रहे हैं। इस परिवार की प्रतिबद्धता भाषा संरक्षण और पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी संचरण पर शोध करने वालों के लिए एक अनोखा केस स्टडी बनती है।
मीडिया ने इस घर को आज भी संस्कृत की प्रासंगिकता का जीवंत उदाहरण बताया है, जबकि परिवार यह रेखांकित करता है कि उनका उद्देश्य सांस्कृतिक निरंतरता है, न कि प्रचार‑प्रसार।
परिवार का कहना है कि यह कदम प्राचीन भाषा को जीवित रखने और बच्चों को सांस्कृतिक जड़ें प्रदान करने के इरादे से उठाया गया था। सभी सदस्य प्रवाहपूर्ण रूप से संस्कृत बोलते हैं, जबकि बच्चों को क्षेत्रीय भाषा और संस्कृत दोनों में शिक्षा दी गई है, जिससे वे स्कूल की पढ़ाई के साथ अपनी भाषा की परम्परा भी बनाए रखते हैं।
भाषा विशेषज्ञ बताते हैं कि घर में इतने लंबे समय तक संस्कृत का दैनिक उपयोग अत्यंत दुर्लभ है; अधिकांश पुनरुज्जीवन प्रयास स्कूलों और मंदिरों तक सीमित रहे हैं। इस परिवार की प्रतिबद्धता भाषा संरक्षण और पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी संचरण पर शोध करने वालों के लिए एक अनोखा केस स्टडी बनती है।
मीडिया ने इस घर को आज भी संस्कृत की प्रासंगिकता का जीवंत उदाहरण बताया है, जबकि परिवार यह रेखांकित करता है कि उनका उद्देश्य सांस्कृतिक निरंतरता है, न कि प्रचार‑प्रसार।