📷 चित्र स्रोत: The Hindu (via NewsData)
शिक्षा
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर जगत मुरारी की FTII विरासत पर प्रकाश
✍️ The Hindu
🗓 19 अग. 2026, 11:39 AM
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2026 के स्वतंत्रता दिवस पर, द हिन्दू ने जगत मुरारी की FTII में योगदान को दोहराते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या सार्वजनिक फिल्म संस्थान आज भी स्वतंत्र सर्जकों को पोषित कर सकते हैं।
द हिन्दू ने 15 अगस्त 2026 को प्रकाशित स्वतंत्रता दिवस विशेष में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) के पूर्व निदेशक जगत मुरारी की स्थायी छाप को फिर से उजागर किया है। मुरारी ने संस्थान के प्रारंभिक दौर में दिशा-निर्देश तय किए और उन फिल्म निर्माताओं को तैयार किया जिन्होंने पारंपरिक कथा‑शैलियों को चुनौती दी और कलात्मक स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया।
लेख में बताया गया है कि मुरारी के नेतृत्व में FTII ने विरोधी आवाज़ों के लिए एक प्रयोगशाला का काम किया, जिससे भारत की समानांतर फिल्म आंदोलन के प्रमुख निर्देशक उभरे। अब सवाल यह है कि क्या आज के सार्वजनिक फिल्म संस्थान बदलते नीतियों और वित्तीय सीमाओं के बीच भी समान स्वतंत्र सोच को पोषित कर सकते हैं।
वर्तमान में ब्यूरोक्रेटिक हस्तक्षेप और बजट प्रतिबंधों को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं, जो FTII की रचनात्मक स्वायत्तता को कमजोर कर सकते हैं। यह चर्चा भारत के सांस्कृतिक और शैक्षिक ढांचे की समग्र सेहत के लिए संस्थान के भविष्य को एक कसौटी मानती है।
समापन में लेख नीति निर्माताओं से आग्रह करता है कि वे FTII के मूल उद्देश्य – प्रयोगात्मक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म निर्माण के लिए एक आश्रयस्थल – को पुनः स्थापित करें, ताकि देश अपनी समृद्ध सिनेमाई विरासत को संजो कर रख सके।
लेख में बताया गया है कि मुरारी के नेतृत्व में FTII ने विरोधी आवाज़ों के लिए एक प्रयोगशाला का काम किया, जिससे भारत की समानांतर फिल्म आंदोलन के प्रमुख निर्देशक उभरे। अब सवाल यह है कि क्या आज के सार्वजनिक फिल्म संस्थान बदलते नीतियों और वित्तीय सीमाओं के बीच भी समान स्वतंत्र सोच को पोषित कर सकते हैं।
वर्तमान में ब्यूरोक्रेटिक हस्तक्षेप और बजट प्रतिबंधों को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं, जो FTII की रचनात्मक स्वायत्तता को कमजोर कर सकते हैं। यह चर्चा भारत के सांस्कृतिक और शैक्षिक ढांचे की समग्र सेहत के लिए संस्थान के भविष्य को एक कसौटी मानती है।
समापन में लेख नीति निर्माताओं से आग्रह करता है कि वे FTII के मूल उद्देश्य – प्रयोगात्मक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म निर्माण के लिए एक आश्रयस्थल – को पुनः स्थापित करें, ताकि देश अपनी समृद्ध सिनेमाई विरासत को संजो कर रख सके।