📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Maulik Kansara
स्वास्थ्य
गुजरात के 50 के दशक के दंपति ने बेटे की आत्महत्या के बाद IVF मुकदमे में जीत हासिल की
✍️ indianexpress.com
🗓 04 सित. 2026, 08:33 PM
👁 32
गुजरात के 50‑के दशक के दंपति ने अपने डॉक्टर बेटे की आत्महत्या के बाद IVF के अधिकार के लिए अदालत का फैसला जीत लिया।
गुजरात के 50 के दशक के दंपति ने अपने एकमात्र बेटे, जो डॉक्टर था, की आत्महत्या के बाद इन‑विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) करवाने की अनुमति के लिए न्यायालय में याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि IVF से इनकार करने से उन्हें अपने परिवार को फिर से स्थापित करने का अवसर नहीं मिलेगा।
सत्र में वरिष्ठ दंपतियों के लिए सहायक प्रजनन तकनीक के कानूनी और नैतिक पहलुओं की जांच की गई और अंततः उन्हें उपचार जारी रखने का अधिकार दिया गया। यह निर्णय भारत में वृद्ध माता‑पिता की प्रजनन इच्छाओं को मान्यता देने की न्यायिक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला समान परिस्थितियों में अन्य दंपतियों के लिए मिसाल बन सकता है, जहाँ IVF प्रक्रिया में कई बाधाएँ आती हैं। यह निर्णय सहायक प्रजनन तकनीकों को आयु की परवाह किए बिना वैध चिकित्सा विकल्प के रूप में स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
दंपति ने इस फैसले को अपने गहरे शोक के बाद एक नई आशा के रूप में बताया, जिससे उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग मिला है। उनका मामला मानसिक स्वास्थ्य, डॉक्टरों में आत्महत्या और शोकग्रस्त परिवारों के समर्थन प्रणाली पर व्यापक सामाजिक चर्चा को भी उजागर करता है।
सत्र में वरिष्ठ दंपतियों के लिए सहायक प्रजनन तकनीक के कानूनी और नैतिक पहलुओं की जांच की गई और अंततः उन्हें उपचार जारी रखने का अधिकार दिया गया। यह निर्णय भारत में वृद्ध माता‑पिता की प्रजनन इच्छाओं को मान्यता देने की न्यायिक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला समान परिस्थितियों में अन्य दंपतियों के लिए मिसाल बन सकता है, जहाँ IVF प्रक्रिया में कई बाधाएँ आती हैं। यह निर्णय सहायक प्रजनन तकनीकों को आयु की परवाह किए बिना वैध चिकित्सा विकल्प के रूप में स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
दंपति ने इस फैसले को अपने गहरे शोक के बाद एक नई आशा के रूप में बताया, जिससे उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग मिला है। उनका मामला मानसिक स्वास्थ्य, डॉक्टरों में आत्महत्या और शोकग्रस्त परिवारों के समर्थन प्रणाली पर व्यापक सामाजिक चर्चा को भी उजागर करता है।