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28 Sep 2026•
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फसल पर हाथियों का कहर, 15 दिन में 200 किसानों को नुकसान
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फसल पर हाथियों का कहर, 15 दिन में 200 किसानों को नुकसान

✍️ Reporter: Vishwanath Pratap Singh 🗓 31 Aug 2026, 09:02 AM 👁 47
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कोरबा वन मंडल में धरमजयगढ़ क्षेत्र से आया एक दंतैल हाथी कुदमुरा रेंज के कलमीटिकरा पहुंच गया है।

कोरबा वन मंडल में धरमजयगढ़ क्षेत्र से आया एक दंतैल हाथी कुदमुरा रेंज के कलमीटिकरा पहुंच गया है। क्षेत्र में पहुंचते ही हाथी ने बरपाली इलाके में एक किसान की धान की फसल को रौंदकर बर्बाद कर दिया। पिछले 15 दिनों में हाथियों के झुंड जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में करीब 200 किसानों की धान की फसल को नुकसान पहुंचा चुके हैं। धान की फसल तैयार होने के साथ ही हाथियों की सक्रियता बढ़ने से ग्रामीणों की चिंता भी बढ़ गई है।
करतला रेंज के लबेद क्षेत्र में करीब 15 हाथी मौजूद हैं। वहीं कटघोरा वन मंडल के केंदई और पसान रेंज में करीब 50 हाथियों की आवाजाही बनी हुई है। इन क्षेत्रों में हाथी लगातार खेतों में पहुंचकर धान की फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दंतैल हाथियों के गांवों में घुसने से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। कई स्थानों पर हाथियों द्वारा मकानों को भी नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आई हैं। कोरबी के आसपास घूम रहा एक दंतैल कई बार हाईवे तक पहुंच रहा है, जिससे सड़क पर भी खतरा बना हुआ है।
रेंजर अभिषेक दुबे ने बताया कि हाथियों की लगातार आवाजाही को देखते हुए निगरानी बढ़ा दी गई है। पसान रेंज में मरवाही की ओर से पहुंचे हाथी फिलहाल सीमा क्षेत्र में ही विचरण कर रहे हैं। धान की फसल लगने के बाद हाथियों के झुंड दिन के समय भी खेतों में पहुंचकर फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ग्रामीण इंद्रपाल मरावी का कहना है कि फसल को हुए वास्तविक नुकसान की तुलना में मुआवजा कम मिलता है। हाथियों के डर से किसान खेतों में जाने से भी बच रहे हैं। इसके बावजूद ग्रामीण फसल बचाने के लिए समूह बनाकर हाथियों को खदेड़ने खेतों तक पहुंच रहे हैं। कई बार इस दौरान हाथी आक्रामक हो जाते हैं, जिससे ग्रामीणों की जान पर भी खतरा बना रहता है।
हाथियों ने अब छोटी पहाड़ियों को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाना शुरू कर दिया है। करतला रेंज का लबेद, जटगा रेंज का कुटेश्वर नगोई और केंदई रेंज की कोरबी पहाड़ी हाथियों की पसंदीदा जगह बन गई है। यहां हाथी लंबे समय तक ठहर रहे हैं। कुदमुरा रेंज का कलमीटिकरा भी हाथियों के आवागमन का प्रमुख प्रवेश द्वार बन गया है। इसके आगे धरमजयगढ़ की सीमा लगी होने के कारण इस मार्ग से हाथियों की आवाजाही लगातार बनी हुई है।
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