📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Raakesh Blokhra
अपराध
पीएच हाई कोर्ट में सीजेपी सौरव दास के खिलाफ एक्स पोस्ट पर आपराधिक अपमान याचिका दायर
✍️ Live Law
🗓 10 सित. 2026, 06:49 PM
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पीएच हाई कोर्ट में सौरव दास के खिलाफ एक्स पर पोस्ट को लेकर आपराधिक अपमान की याचिका दायर की गई है।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में सौरव दास, पंजाब के मुख्य न्यायाधीश, के खिलाफ एक्स पर किए गए एक पोस्ट को लेकर आपराधिक अपमान याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि उक्त पोस्ट ने मुख्य न्यायाधीश के पद को अपमानित किया है और न्यायालय के अपमान अधिनियम का उल्लंघन किया है।
पेश किए गए तर्कों में कहा गया है कि पोस्ट में मुख्य न्यायाधीश को अपमानजनक रूप से उल्लेखित किया गया है, जिससे न्यायपालिका पर जनता का भरोसा घट सकता है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से ऐसी कार्रवाई का अनुरोध किया है जिससे दोष सिद्ध होने पर जुर्माना या कारावास जैसी सजा हो सकती है।
अभी तक कोर्ट ने सुनवाई की तिथि निर्धारित नहीं की है और सौरव दास ने इस आरोप पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह मामला भारत में न्यायिक व्यक्तियों के सोशल मीडिया उपयोग पर बढ़ती निगरानी को उजागर करता है।
यदि याचिका आगे बढ़ती है, तो इसे 1971 के न्यायालय अपमान अधिनियम की धारा 2 के तहत जांचा जाएगा, जो न्यायालय की प्रतिष्ठा को घटाने वाले कार्य को आपराधिक अपमान मानता है।
कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज समूहों सहित कई हितधारक इस विकास को बारीकी से देख रहे हैं, क्योंकि इसका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही पर संभावित प्रभाव हो सकता है।
पेश किए गए तर्कों में कहा गया है कि पोस्ट में मुख्य न्यायाधीश को अपमानजनक रूप से उल्लेखित किया गया है, जिससे न्यायपालिका पर जनता का भरोसा घट सकता है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से ऐसी कार्रवाई का अनुरोध किया है जिससे दोष सिद्ध होने पर जुर्माना या कारावास जैसी सजा हो सकती है।
अभी तक कोर्ट ने सुनवाई की तिथि निर्धारित नहीं की है और सौरव दास ने इस आरोप पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह मामला भारत में न्यायिक व्यक्तियों के सोशल मीडिया उपयोग पर बढ़ती निगरानी को उजागर करता है।
यदि याचिका आगे बढ़ती है, तो इसे 1971 के न्यायालय अपमान अधिनियम की धारा 2 के तहत जांचा जाएगा, जो न्यायालय की प्रतिष्ठा को घटाने वाले कार्य को आपराधिक अपमान मानता है।
कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज समूहों सहित कई हितधारक इस विकास को बारीकी से देख रहे हैं, क्योंकि इसका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही पर संभावित प्रभाव हो सकता है।