📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Bernard Gagnon
राजनीति
उज्जैन में ₹200 करोड़ टेंपल बांड पर कांग्रेस ने उठाया राजनीतिक विवाद
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 22 अक्टू. 2026, 04:31 PM
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उज्जैन के 11 प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास हेतु टेंपल बांड से ₹200 करोड़ जुटाने की योजना पर कांग्रेस के पी.सी. शर्मा ने इसे धर्म के नाम पर धंधा कहा है।
उज्जैन नगर निगम ने शहर के ग्यारह प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास के लिए ₹1,124 करोड़ के मास्टर प्लान की घोषणा की है। इस योजना के तहत टेंपल बांड के माध्यम से ₹200 करोड़ जुटाने की योजना बनाई गई है, जिससे भक्तों और निवेशकों को बंधक खरीद कर विकास कार्य में योगदान करने का अवसर मिलेगा।
कांग्रेस नेता पी.सी. शर्मा ने इस बांड प्रस्ताव पर तीखा सवाल उठाते हुए इसे धर्म के नाम पर धंधा कहा। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन को धार्मिक फंडरेज़िंग के साथ मिलाना उचित नहीं है और इससे भक्तों का शोषण हो सकता है।
शासन पक्ष इस बांड को तीव्रता से तीर्थस्थलों के बुनियादी ढाँचे को सुधारने, पर्यटन को बढ़ावा देने और क्षेत्र में रोजगार सृजन करने के साधन के रूप में पेश कर रहा है। बांड जारी करने का अंतिम निर्णय अभी तक नहीं लिया गया है और इस मुद्दे पर राज्य विधानसभा में बहस जारी रहने की संभावना है।
धार्मिक प्रबंधन समितियों और स्थानीय व्यापार समूहों में इस प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखी जा रही हैं; कुछ बेहतर सुविधाओं की आशा व्यक्त कर रहे हैं, जबकि अन्य बांड की शर्तों और जुटाए गए धन के वितरण में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।
यह विवाद धार्मिक संस्थानों को शामिल करने वाले विकास परियोजनाओं और भारत में धर्म‑आधारित वित्तीय साधनों के उपयोग के आसपास की राजनीतिक बहस को उजागर करता है।
कांग्रेस नेता पी.सी. शर्मा ने इस बांड प्रस्ताव पर तीखा सवाल उठाते हुए इसे धर्म के नाम पर धंधा कहा। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन को धार्मिक फंडरेज़िंग के साथ मिलाना उचित नहीं है और इससे भक्तों का शोषण हो सकता है।
शासन पक्ष इस बांड को तीव्रता से तीर्थस्थलों के बुनियादी ढाँचे को सुधारने, पर्यटन को बढ़ावा देने और क्षेत्र में रोजगार सृजन करने के साधन के रूप में पेश कर रहा है। बांड जारी करने का अंतिम निर्णय अभी तक नहीं लिया गया है और इस मुद्दे पर राज्य विधानसभा में बहस जारी रहने की संभावना है।
धार्मिक प्रबंधन समितियों और स्थानीय व्यापार समूहों में इस प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखी जा रही हैं; कुछ बेहतर सुविधाओं की आशा व्यक्त कर रहे हैं, जबकि अन्य बांड की शर्तों और जुटाए गए धन के वितरण में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।
यह विवाद धार्मिक संस्थानों को शामिल करने वाले विकास परियोजनाओं और भारत में धर्म‑आधारित वित्तीय साधनों के उपयोग के आसपास की राजनीतिक बहस को उजागर करता है।