📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Amiyashrivastava (talk) (Uploads)
अपराध
छत्तीसगढ़ HC ने 498A से बरी महिला को घरेलू हिंसा केस दायर करने की अनुमति
✍️ The Times of India
🗓 28 अग. 2026, 01:33 PM
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि 498A के तहत बरी हुई महिला अभी भी घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करा सकती है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत बरी होने से महिला को घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम के तहत केस दायर करने से नहीं रोका जा सकता। यह निर्णय एक ऐसी महिला द्वारा दायर याचिका पर दिया गया था, जिसे दहेज‑संबंधी हत्या के आरोप में बरी किया गया था, पर वह अपने वैवाहिक जीवन में हो रहे दुरुपयोग के लिए राहत चाहती थी।
न्यायालय ने बताया कि 498A और घरेलू‑हिंसा कानून दो अलग‑अलग कानूनी मुद्दों को संबोधित करते हैं: 498A दहेज से जुड़ी क्रूरता को दंडित करता है, जबकि घरेलू‑हिंसा अधिनियम शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा करता है। इसलिए बरी हुई महिला को इस अधिनियम के तहत सुरक्षा, मुआवजा या संरक्षक आदेश प्राप्त करने का अधिकार है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय यह सिद्धांत मजबूत करता है कि एक आपराधिक मामले में बरी होना किसी अन्य लागू कानून के तहत पीड़िता के अधिकारों को समाप्त नहीं करता। यह आदेश राज्य के निचले न्यायालयों को समान मामलों में मार्गदर्शन देगा।
इस आदेश से पूर्व की बरी होने की स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि महिला को अब पारिवारिक न्यायालय में घरेलू‑हिंसा याचिका दायर करने की अनुमति मिलेगी, जिससे सुरक्षा आदेश, आर्थिक राहत या बाल अभिरक्षा संबंधी निर्देश मिल सकते हैं।
न्यायालय ने बताया कि 498A और घरेलू‑हिंसा कानून दो अलग‑अलग कानूनी मुद्दों को संबोधित करते हैं: 498A दहेज से जुड़ी क्रूरता को दंडित करता है, जबकि घरेलू‑हिंसा अधिनियम शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा करता है। इसलिए बरी हुई महिला को इस अधिनियम के तहत सुरक्षा, मुआवजा या संरक्षक आदेश प्राप्त करने का अधिकार है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय यह सिद्धांत मजबूत करता है कि एक आपराधिक मामले में बरी होना किसी अन्य लागू कानून के तहत पीड़िता के अधिकारों को समाप्त नहीं करता। यह आदेश राज्य के निचले न्यायालयों को समान मामलों में मार्गदर्शन देगा।
इस आदेश से पूर्व की बरी होने की स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि महिला को अब पारिवारिक न्यायालय में घरेलू‑हिंसा याचिका दायर करने की अनुमति मिलेगी, जिससे सुरक्षा आदेश, आर्थिक राहत या बाल अभिरक्षा संबंधी निर्देश मिल सकते हैं।