📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / IDFC First Bank Photos
अपराध
CBI ने ₹504 करोड़ के IDFC बैंक धोखाधड़ी में 6 IAS अधिकारियों पर आरोप लगाए
✍️ Hindustan Times
🗓 03 सित. 2026, 02:33 PM
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सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने IDFC बैंक के ₹504 करोड़ के धोखाधड़ी मामले में छह IAS अधिकारियों को आरोपी बताया, हिंदुस्तान टाइम्स ने रिपोर्ट किया।
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने हाल ही में IDFC बैंक के लगभग ₹504 करोड़ के धोखाधड़ी मामले में शामिल छह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों के नाम सार्वजनिक किए हैं। यह खुलासा इस जांच में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसकी शुरुआत इस वर्ष की शुरुआत में हुई थी।
जांच के अनुसार, इन अधिकारियों ने नकली खातों का निर्माण करके और ऋण राशि को अपने जुड़े संस्थानों में भेजकर इस घोटाले को अंजाम दिया। इस प्रक्रिया में निकाली गई धनराशि को व्यक्तिगत देनदारियों को चुकाने और अन्य व्यावसायिक उद्यमों में निवेश करने के लिए उपयोग किया गया, जिससे बैंकिंग नियमों और सार्वजनिक भरोसे का उल्लंघन हुआ।
CBI ने इस मामले को भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज किया है। अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा और जांच के आगे बढ़ने पर अतिरिक्त गिरफ्तारियों की संभावना जताई गई है। अभी तक IDFC बैंक या आरोपित अधिकारियों ने कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी से शासन और सार्वजनिक‑क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों की निगरानी पर गहरा असर पड़ सकता है। इस मामले को नियामकों और जनता दोनों ने बड़े पैमाने पर देखा है, क्योंकि यह आकार और शामिल व्यक्तियों की प्रोफ़ाइल दोनों के कारण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जांच के अनुसार, इन अधिकारियों ने नकली खातों का निर्माण करके और ऋण राशि को अपने जुड़े संस्थानों में भेजकर इस घोटाले को अंजाम दिया। इस प्रक्रिया में निकाली गई धनराशि को व्यक्तिगत देनदारियों को चुकाने और अन्य व्यावसायिक उद्यमों में निवेश करने के लिए उपयोग किया गया, जिससे बैंकिंग नियमों और सार्वजनिक भरोसे का उल्लंघन हुआ।
CBI ने इस मामले को भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज किया है। अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा और जांच के आगे बढ़ने पर अतिरिक्त गिरफ्तारियों की संभावना जताई गई है। अभी तक IDFC बैंक या आरोपित अधिकारियों ने कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी से शासन और सार्वजनिक‑क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों की निगरानी पर गहरा असर पड़ सकता है। इस मामले को नियामकों और जनता दोनों ने बड़े पैमाने पर देखा है, क्योंकि यह आकार और शामिल व्यक्तियों की प्रोफ़ाइल दोनों के कारण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।