बीजेपी सरकार में शिकायतों के आंकड़ों पर सवाल! अमेठी में मौके पर 117, सूचना विभाग की रिपोर्ट में सिर्फ 36 का जिक्र
पत्रकार और उसके सहयोगी ने खोली प्रशासन की पोल
अमेठी। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण और जवाबदेह प्रशासन पर जोर देती है। लेकिन अमेठी तहसील में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस के शिकायत संबंधी आंकड़ों में सामने आया अंतर सरकारी दावों और जमीनी स्तर पर सूचना के संकलन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है। जब शिकायतों की संख्या को लेकर ही इतनी बड़ी विसंगति सामने आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी तंत्र में सही आंकड़ों की निगरानी कौन कर रहा है?
शनिवार को तहसील अमेठी में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में 117 शिकायत प्रार्थना पत्र आने का दावा किया गया है, जबकि सूचना विभाग की ओर से जारी जानकारी में केवल 36 शिकायतों का उल्लेख किया गया। दोनों आंकड़ों के बीच 81 शिकायतों का अंतर है। आखिर यह अंतर कैसे पैदा हुआ? क्या तहसील से भेजी गई सूचना अधूरी थी या आंकड़ों के संकलन में कोई बड़ी चूक हुई? इसका जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
मौके पर मौजूद पत्रकार का दावा, ऑन कैमरा हुई गिनती
पत्रकार और उनके सहयोगी के अनुसार, वह स्वयं मौके पर मौजूद थे और उन्होंने अपने एक सहयोगी के साथ शिकायत प्रार्थना पत्रों की गिनती ऑन कैमरा की। उनका दावा है कि इस गिनती से संबंधित वीडियो प्रमाण भी उपलब्ध हैं। इसके बावजूद सूचना विभाग की ओर से 36 शिकायतों की जानकारी जारी होना गंभीर सवाल खड़े करता है।
यदि मौके पर गिनी गई शिकायतों की संख्या 117 है, तो सरकारी सूचना में केवल 36 शिकायतें दर्ज होने का आधार क्या है? क्या उच्चाधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया? यदि नहीं, तो इस चूक की जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सही तस्वीर पहुंच रही है या नहीं?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में प्रशासनिक जवाबदेही और जनशिकायतों के निस्तारण पर जोर देते रहे हैं। ऐसे में अमेठी की यह विसंगति एक अहम सवाल उठाती है—क्या जिला और तहसील स्तर पर तैयार होने वाली रिपोर्ट शासन तक जमीनी हकीकत के अनुरूप पहुंच रही है?
यदि निचले स्तर पर गलत या अधूरी जानकारी भेजी जाती है, तो उच्चाधिकारी वास्तविक समस्याओं का आकलन कैसे करेंगे? सरकारी कार्यक्रमों की सफलता केवल आयोजित बैठकों और जारी प्रेस नोटों से नहीं, बल्कि शिकायतों की सही संख्या, उनके निस्तारण और जनता को मिलने वाली राहत से मापी जानी चाहिए।
सवाल भाजपा सरकार की नीतियों का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही का है जिनकी रिपोर्टिंग से सरकार की जमीनी तस्वीर बनती है। यदि आंकड़ों में गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो उसका असर प्रशासनिक विश्वसनीयता के साथ सरकार की छवि पर भी पड़ सकता है।
उच्चाधिकारी करें जांच, सामने आए पूरा सच
पत्रकार ने जिलाधिकारी अमेठी, मुख्य विकास अधिकारी अमेठी और शासन के संबंधित उच्चाधिकारियों से मामले का स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराने की मांग की है। मांग है कि तहसील के मूल शिकायत रजिस्टर, प्राप्त प्रार्थना पत्रों और सूचना विभाग को भेजी गई रिपोर्ट का मिलान कराया जाए। उपलब्ध वीडियो प्रमाणों की भी जांच की जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि 117 और 36 के आंकड़ों में अंतर क्यों आया।
यदि जांच में जानबूझकर गलत सूचना भेजने या तथ्यों को छिपाने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अन्य तहसीलों से भेजे जाने वाले आंकड़ों की भी समीक्षा की जाए, ताकि शासन तक सही जानकारी पहुंचे।
बड़ा सवाल: 81 शिकायतों का अंतर किसकी जवाबदेही?
जनता अपनी समस्या लेकर सम्पूर्ण समाधान दिवस में पहुंचती है, इस उम्मीद के साथ कि उसकी फरियाद सुनी जाएगी। ऐसे में शिकायतों की संख्या को लेकर सामने आया यह अंतर केवल कागजी आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा भी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासन से सवाल है—जब मौके की गिनती और आधिकारिक सूचना में इतना बड़ा अंतर सामने आ रहा है, तो इसकी जांच कब होगी और जनता के सामने सही आंकड़े कौन रखेगा?
अब निगाहें जिला प्रशासन और शासन के अगले कदम पर हैं। जांच से ही स्पष्ट होगा कि यह अंतर मानवीय चूक था, रिपोर्टिंग की त्रुटि या इसके पीछे कोई अन्य कारण।
शनिवार को तहसील अमेठी में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में 117 शिकायत प्रार्थना पत्र आने का दावा किया गया है, जबकि सूचना विभाग की ओर से जारी जानकारी में केवल 36 शिकायतों का उल्लेख किया गया। दोनों आंकड़ों के बीच 81 शिकायतों का अंतर है। आखिर यह अंतर कैसे पैदा हुआ? क्या तहसील से भेजी गई सूचना अधूरी थी या आंकड़ों के संकलन में कोई बड़ी चूक हुई? इसका जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
मौके पर मौजूद पत्रकार का दावा, ऑन कैमरा हुई गिनती
पत्रकार और उनके सहयोगी के अनुसार, वह स्वयं मौके पर मौजूद थे और उन्होंने अपने एक सहयोगी के साथ शिकायत प्रार्थना पत्रों की गिनती ऑन कैमरा की। उनका दावा है कि इस गिनती से संबंधित वीडियो प्रमाण भी उपलब्ध हैं। इसके बावजूद सूचना विभाग की ओर से 36 शिकायतों की जानकारी जारी होना गंभीर सवाल खड़े करता है।
यदि मौके पर गिनी गई शिकायतों की संख्या 117 है, तो सरकारी सूचना में केवल 36 शिकायतें दर्ज होने का आधार क्या है? क्या उच्चाधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया? यदि नहीं, तो इस चूक की जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सही तस्वीर पहुंच रही है या नहीं?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में प्रशासनिक जवाबदेही और जनशिकायतों के निस्तारण पर जोर देते रहे हैं। ऐसे में अमेठी की यह विसंगति एक अहम सवाल उठाती है—क्या जिला और तहसील स्तर पर तैयार होने वाली रिपोर्ट शासन तक जमीनी हकीकत के अनुरूप पहुंच रही है?
यदि निचले स्तर पर गलत या अधूरी जानकारी भेजी जाती है, तो उच्चाधिकारी वास्तविक समस्याओं का आकलन कैसे करेंगे? सरकारी कार्यक्रमों की सफलता केवल आयोजित बैठकों और जारी प्रेस नोटों से नहीं, बल्कि शिकायतों की सही संख्या, उनके निस्तारण और जनता को मिलने वाली राहत से मापी जानी चाहिए।
सवाल भाजपा सरकार की नीतियों का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही का है जिनकी रिपोर्टिंग से सरकार की जमीनी तस्वीर बनती है। यदि आंकड़ों में गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो उसका असर प्रशासनिक विश्वसनीयता के साथ सरकार की छवि पर भी पड़ सकता है।
उच्चाधिकारी करें जांच, सामने आए पूरा सच
पत्रकार ने जिलाधिकारी अमेठी, मुख्य विकास अधिकारी अमेठी और शासन के संबंधित उच्चाधिकारियों से मामले का स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराने की मांग की है। मांग है कि तहसील के मूल शिकायत रजिस्टर, प्राप्त प्रार्थना पत्रों और सूचना विभाग को भेजी गई रिपोर्ट का मिलान कराया जाए। उपलब्ध वीडियो प्रमाणों की भी जांच की जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि 117 और 36 के आंकड़ों में अंतर क्यों आया।
यदि जांच में जानबूझकर गलत सूचना भेजने या तथ्यों को छिपाने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अन्य तहसीलों से भेजे जाने वाले आंकड़ों की भी समीक्षा की जाए, ताकि शासन तक सही जानकारी पहुंचे।
बड़ा सवाल: 81 शिकायतों का अंतर किसकी जवाबदेही?
जनता अपनी समस्या लेकर सम्पूर्ण समाधान दिवस में पहुंचती है, इस उम्मीद के साथ कि उसकी फरियाद सुनी जाएगी। ऐसे में शिकायतों की संख्या को लेकर सामने आया यह अंतर केवल कागजी आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा भी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासन से सवाल है—जब मौके की गिनती और आधिकारिक सूचना में इतना बड़ा अंतर सामने आ रहा है, तो इसकी जांच कब होगी और जनता के सामने सही आंकड़े कौन रखेगा?
अब निगाहें जिला प्रशासन और शासन के अगले कदम पर हैं। जांच से ही स्पष्ट होगा कि यह अंतर मानवीय चूक था, रिपोर्टिंग की त्रुटि या इसके पीछे कोई अन्य कारण।