📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / India Post, Government of India
स्वास्थ्य
बिहार में प्लास्टर की जगह गत्ता लगा कर मरीज को रेफ़र किया, सरकारी कार्रवाई
✍️ Amar Ujala · Patna
🗓 07 सित. 2026, 08:25 AM
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बिहार में प्लास्टर की जगह गत्ता लगाकर मरीज को रेफ़र करने की घटना पर स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई की, परंतु ऐसे और मामले सामने आ रहे हैं।
बिहार में एक तस्वीर में दिखा कि मरीज की प्लास्टर की जगह गत्ता (कपड़ा) लगाकर उसे दूसरे सरकारी अस्पताल में रेफ़र किया गया। इस दृश्य ने जनता में गुस्सा पैदा किया और राज्य स्वास्थ्य विभाग का ध्यान आकर्षित किया, जिसके बाद उन्होंने संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू करने की घोषणा की।
विभाग ने बताया कि इस विशेष मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, लेकिन अभी तक इस कदम को अन्य अस्पतालों तक नहीं बढ़ाया गया है जहाँ समान प्रथा चल रही हो सकती है। उन्होंने कहा कि प्रतिक्रिया केवल उस केस तक सीमित है जो मीडिया में आया।
कुछ ही दिनों में एक और तस्वीर सामने आई, जिसमें किसी अन्य अस्पताल में भी प्लास्टर की जगह गत्ता लगाकर उपचार किया गया दिखाया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि समस्या अधिक व्यापक हो सकती है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने सभी सरकारी अस्पतालों से अनुरोध किया कि वे ऑर्थोपेडिक प्रोटोकॉल की पुनः समीक्षा करें और प्लास्टर के बजाय अस्थायी कपड़े के उपयोग से बचें।
यह घटना सार्वजनिक अस्पतालों में चिकित्सा प्रक्रियाओं की कड़ी निगरानी की मांग को फिर से उजागर करती है, जबकि रोगी सुरक्षा संगठनों ने स्टाफ के प्रशिक्षण और नियमित ऑडिट की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
विभाग ने बताया कि इस विशेष मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, लेकिन अभी तक इस कदम को अन्य अस्पतालों तक नहीं बढ़ाया गया है जहाँ समान प्रथा चल रही हो सकती है। उन्होंने कहा कि प्रतिक्रिया केवल उस केस तक सीमित है जो मीडिया में आया।
कुछ ही दिनों में एक और तस्वीर सामने आई, जिसमें किसी अन्य अस्पताल में भी प्लास्टर की जगह गत्ता लगाकर उपचार किया गया दिखाया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि समस्या अधिक व्यापक हो सकती है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने सभी सरकारी अस्पतालों से अनुरोध किया कि वे ऑर्थोपेडिक प्रोटोकॉल की पुनः समीक्षा करें और प्लास्टर के बजाय अस्थायी कपड़े के उपयोग से बचें।
यह घटना सार्वजनिक अस्पतालों में चिकित्सा प्रक्रियाओं की कड़ी निगरानी की मांग को फिर से उजागर करती है, जबकि रोगी सुरक्षा संगठनों ने स्टाफ के प्रशिक्षण और नियमित ऑडिट की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।