📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Michal Klajban
विज्ञान
उत्तarakhand के दो ऊँचे हिमनदी झीलों का जोखिम आकलन करने टीमों ने किया दौरा
✍️ The Times of India
🗓 08 सित. 2026, 11:49 PM
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विशेषज्ञ टीमों ने उत्तराखंड की दो ऊँची हिमनदी झीलों का दौरा कर संभावित बाढ़ जोखिम का आकलन किया।
सरकारी और वैज्ञानिक एजेंसियों ने उत्तराखंड में 4,500 मीटर से ऊपर स्थित दो हिमनदी झीलों की जाँच के लिए फील्ड टीमें भेजी हैं। इनका उद्देश्य जल स्तर, मोरैन की स्थिरता और नीचे के क्षेत्रों की संवेदनशीलता पर वास्तविक डेटा इकट्ठा करना है।
इन झीलों का स्थान चमोली और पिथौरागढ़ जिलों के ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में है, जहाँ ग्लेशियर पिघलने से जलसंचय तेज़ी से बढ़ रहा है। ढलान वाले किनारे और अस्थिर मोरैन बांध अचानक फटने की संभावना रखते हैं, जिससे नीचे के बस्तियों में बाढ़ आ सकती है।
सर्वे टीमें ड्रोन मैपिंग, जीपीएस‑आधारित बैथमेट्री और जल‑गुणवत्ता परीक्षण का उपयोग करके विस्तृत जोखिम मॉडल तैयार कर रही हैं। इन परिणामों को राज्य की आपदा प्रबंधन योजना में शामिल किया जाएगा और आवश्यक इंजीनियरिंग उपायों की दिशा तय की जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में ऐसे ग्लेशियल झीलों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए समय‑समय पर जोखिम आकलन करना निचले क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक है।
इन झीलों का स्थान चमोली और पिथौरागढ़ जिलों के ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में है, जहाँ ग्लेशियर पिघलने से जलसंचय तेज़ी से बढ़ रहा है। ढलान वाले किनारे और अस्थिर मोरैन बांध अचानक फटने की संभावना रखते हैं, जिससे नीचे के बस्तियों में बाढ़ आ सकती है।
सर्वे टीमें ड्रोन मैपिंग, जीपीएस‑आधारित बैथमेट्री और जल‑गुणवत्ता परीक्षण का उपयोग करके विस्तृत जोखिम मॉडल तैयार कर रही हैं। इन परिणामों को राज्य की आपदा प्रबंधन योजना में शामिल किया जाएगा और आवश्यक इंजीनियरिंग उपायों की दिशा तय की जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में ऐसे ग्लेशियल झीलों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए समय‑समय पर जोखिम आकलन करना निचले क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक है।