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11 Oct 2026•
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अररिया के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय कुशेश्वर झा: नौ बार जेल, ताम्रपत्र से सम्मानित
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अररिया के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय कुशेश्वर झा: नौ बार जेल, ताम्रपत्र से सम्मानित

✍️ Reporter: Kanhaiya Kumar Jha 🗓 11 Oct 2026, 05:09 PM 👁 38
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बिहार के अररिया जिले के स्वर्गीय कुशेश्वर झा ने स्वतंत्रता संग्राम में नौ बार जेल जाने और यातनाएं सहने के बावजूद राष्ट्रसेवा की। भारत सरकार ने 15 अगस्त 1972 को उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया।

भारत की आज़ादी लाखों ज्ञात-अज्ञात वीरों के त्याग, संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम स्वर्गीय कुशेश्वर झा का है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध निर्भीक होकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और अनेक यातनाएँ सहते हुए राष्ट्रसेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। स्वर्गीय कुशेश्वर झा का जन्म 15 अगस्त 1899 को वर्तमान जयनगर, वार्ड संख्या–09, प्रखंड भरगामा, जिला अररिया (बिहार) में हुआ था। वे महात्मा गांधी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे और असहयोग, भारत छोड़ो तथा अन्य स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रूप से सहभागी बने।

उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को संगठित कर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनजागरण चलाया। वे गाँव-गाँव जाकर युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते थे तथा "अंग्रेज़ो भारत छोड़ो" का संदेश फैलाते थे। उनके नेतृत्व में कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन के विरोध में सभाएँ और आंदोलन आयोजित हुए। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार वे कुल नौ बार जेल गए तथा अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलीं, किन्तु उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनके संघर्ष ने आसपास के क्षेत्र के अनेक युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

महात्मा गांधी जब फारबिसगंज क्षेत्र के दौरे पर आए थे, तब कुशेश्वर झा उनके साथ रहे और स्थानीय स्तर पर आंदोलन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीणों के अनुसार वे अत्यंत सरल, ईमानदार और निस्वार्थ व्यक्तित्व के धनी थे। देश की स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने उनके योगदान को सम्मानित किया। 15 अगस्त 1972 को स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगाँठ (रजत जयंती) पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी स्वीकृत हुई। उनके नाम का उल्लेख पूर्णिया प्रमंडल के स्वतंत्रता सेनानियों के शिलालेख पर भी अंकित है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उन्होंने सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे सदैव सत्य, सादगी, नैतिकता और राष्ट्रसेवा के मूल्यों का पालन करते रहे। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 5 जुलाई 1983 को उनका निधन हो गया, किंतु उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की अमर गाथा आज भी लोगों के हृदय में जीवित है। समय के साथ उनका नाम भले ही व्यापक स्तर पर प्रसिद्ध न हो पाया हो, परन्तु उनका योगदान भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का अमूल्य अध्याय है।
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