अमेठी तहसील में 28 शिकायतें दर्ज, जबकि फरियादियों की संख्या को लेकर उठे गंभीर सवाल—आंकड़ों की पारदर्शिता पर जनता ने मांगा जवाब
कागज पर समाधान, धरातल पर सवाल!
अमेठी। जनसमस्याओं के त्वरित और पारदर्शी निस्तारण के लिए आयोजित होने वाला सम्पूर्ण समाधान दिवस अब सवालों के घेरे में है। शनिवार को जिले की चारों तहसीलों में आयोजित समाधान दिवस को लेकर उपलब्ध प्रशासनिक आंकड़ों में कुल 142 शिकायतें दर्ज बताई गईं। इनमें तिलोई में 61, गौरीगंज में 34, मुसाफिरखाना में 19 और अमेठी तहसील में 28 शिकायतें दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या समाधान दिवस में पहुंचने वाला हर फरियादी वास्तव में पोर्टल और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो रहा है?
🔥 अमेठी में 28 का आंकड़ा, लेकिन सवाल उससे कहीं बड़ा
अमेठी तहसील में आधिकारिक तौर पर 28 शिकायतें दर्ज बताई गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर पर समाधान दिवस में बड़ी संख्या में फरियादियों के पहुंचने और प्रार्थना पत्र दिए जाने के दावों के बीच अब यह मांग उठ रही है कि कितने प्रार्थना पत्र प्राप्त हुए, कितने ऑनलाइन दर्ज हुए और प्रत्येक शिकायत को कौन-सा शिकायत नंबर मिला—इसका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
यदि कोई शिकायत कागज पर ली गई लेकिन ऑनलाइन जनसुनवाई व्यवस्था में दर्ज नहीं हुई, तो उसके निस्तारण की निगरानी आखिर कैसे होगी?
⚠️ 142 शिकायतें, मौके पर सिर्फ 9 निस्तारण
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार तिलोई में 61 में से 4, गौरीगंज में 34 में से 4 और मुसाफिरखाना में 19 में से 1 शिकायत का मौके पर निस्तारण बताया गया। अमेठी की 28 शिकायतों के लिए राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीमें भेजे जाने की जानकारी दी गई है।
यानी चारों तहसीलों के आंकड़ों को देखें तो 142 शिकायतों में मौके पर 9 शिकायतों के निस्तारण की बात सामने आती है।
बाकी शिकायतों का क्या हुआ?
क्या फरियादियों को शिकायत संख्या मिली?
क्या उन्हें ऑनलाइन स्टेटस उपलब्ध कराया गया?
कितनी शिकायतें जांच के लिए भेजी गईं?
कितनी शिकायतों का निस्तारण हो चुका है?
और सबसे अहम—क्या शिकायतकर्ता निस्तारण से संतुष्ट हैं?
💥 समाधान दिवस में बार-बार लौट रहे फरियादी
इन सवालों को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि अमेठी में समाधान दिवस से जुड़ी हालिया रिपोर्टों में ऐसे फरियादियों की समस्याएं सामने आई हैं, जो पहले भी शिकायत कर चुके हैं लेकिन समाधान के लिए दोबारा अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। कुछ मामलों में लोगों ने कई महीनों या वर्षों से शिकायत लंबित होने की बात कही है।
ऐसे में सिर्फ शिकायतों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। असल परीक्षा यह है कि शिकायतकर्ता को न्याय मिला या नहीं।
🔥 जनता पूछ रही है—आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं?
अगर प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर हर शिकायत का विवरण सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है?
कितने प्रार्थना पत्र आए?
कितने IGRS पर दर्ज हुए?
कितनों को शिकायत संख्या मिली?
कितने निस्तारित हुए?
कितने लंबित हैं?
और कितने फरियादी निस्तारण से संतुष्ट हैं?
उत्तर प्रदेश सरकार की जनसुनवाई व्यवस्था में शिकायत दर्ज कराने और उसकी स्थिति जानने की सुविधा उपलब्ध है।
🚨 अब जांच होनी चाहिए, सिर्फ सफाई नहीं
अमेठी के मामले में सवाल किसी अधिकारी या सरकार पर सीधे आरोप लगाने का नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की पारदर्शिता जांचने का है।
यदि समाधान दिवस में प्राप्त प्रत्येक प्रार्थना पत्र का ऑनलाइन रिकॉर्ड मौजूद है तो प्रशासन उसे सार्वजनिक करे। यदि आंकड़ों में अंतर है तो यह भी स्पष्ट किया जाए कि अंतर क्यों हुआ।
जनता को फोटो खिंचवाने वाला समाधान दिवस नहीं, अपनी शिकायत का नंबर, कार्रवाई और अंतिम परिणाम चाहिए।
अब देखने वाली बात यह है कि अमेठी प्रशासन इन आंकड़ों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करता है या फिर ‘28 शिकायतों’ का आंकड़ा ही समाधान दिवस की पूरी कहानी मान लिया जाएगा?
📌 सवाल सीधा है—समाधान दिवस में शिकायतें गिनी जा रही हैं या वास्तव में समस्याओं का समाधान भी हो रहा है?
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या समाधान दिवस में पहुंचने वाला हर फरियादी वास्तव में पोर्टल और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो रहा है?
🔥 अमेठी में 28 का आंकड़ा, लेकिन सवाल उससे कहीं बड़ा
अमेठी तहसील में आधिकारिक तौर पर 28 शिकायतें दर्ज बताई गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर पर समाधान दिवस में बड़ी संख्या में फरियादियों के पहुंचने और प्रार्थना पत्र दिए जाने के दावों के बीच अब यह मांग उठ रही है कि कितने प्रार्थना पत्र प्राप्त हुए, कितने ऑनलाइन दर्ज हुए और प्रत्येक शिकायत को कौन-सा शिकायत नंबर मिला—इसका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
यदि कोई शिकायत कागज पर ली गई लेकिन ऑनलाइन जनसुनवाई व्यवस्था में दर्ज नहीं हुई, तो उसके निस्तारण की निगरानी आखिर कैसे होगी?
⚠️ 142 शिकायतें, मौके पर सिर्फ 9 निस्तारण
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार तिलोई में 61 में से 4, गौरीगंज में 34 में से 4 और मुसाफिरखाना में 19 में से 1 शिकायत का मौके पर निस्तारण बताया गया। अमेठी की 28 शिकायतों के लिए राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीमें भेजे जाने की जानकारी दी गई है।
यानी चारों तहसीलों के आंकड़ों को देखें तो 142 शिकायतों में मौके पर 9 शिकायतों के निस्तारण की बात सामने आती है।
बाकी शिकायतों का क्या हुआ?
क्या फरियादियों को शिकायत संख्या मिली?
क्या उन्हें ऑनलाइन स्टेटस उपलब्ध कराया गया?
कितनी शिकायतें जांच के लिए भेजी गईं?
कितनी शिकायतों का निस्तारण हो चुका है?
और सबसे अहम—क्या शिकायतकर्ता निस्तारण से संतुष्ट हैं?
💥 समाधान दिवस में बार-बार लौट रहे फरियादी
इन सवालों को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि अमेठी में समाधान दिवस से जुड़ी हालिया रिपोर्टों में ऐसे फरियादियों की समस्याएं सामने आई हैं, जो पहले भी शिकायत कर चुके हैं लेकिन समाधान के लिए दोबारा अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। कुछ मामलों में लोगों ने कई महीनों या वर्षों से शिकायत लंबित होने की बात कही है।
ऐसे में सिर्फ शिकायतों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। असल परीक्षा यह है कि शिकायतकर्ता को न्याय मिला या नहीं।
🔥 जनता पूछ रही है—आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं?
अगर प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर हर शिकायत का विवरण सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है?
कितने प्रार्थना पत्र आए?
कितने IGRS पर दर्ज हुए?
कितनों को शिकायत संख्या मिली?
कितने निस्तारित हुए?
कितने लंबित हैं?
और कितने फरियादी निस्तारण से संतुष्ट हैं?
उत्तर प्रदेश सरकार की जनसुनवाई व्यवस्था में शिकायत दर्ज कराने और उसकी स्थिति जानने की सुविधा उपलब्ध है।
🚨 अब जांच होनी चाहिए, सिर्फ सफाई नहीं
अमेठी के मामले में सवाल किसी अधिकारी या सरकार पर सीधे आरोप लगाने का नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की पारदर्शिता जांचने का है।
यदि समाधान दिवस में प्राप्त प्रत्येक प्रार्थना पत्र का ऑनलाइन रिकॉर्ड मौजूद है तो प्रशासन उसे सार्वजनिक करे। यदि आंकड़ों में अंतर है तो यह भी स्पष्ट किया जाए कि अंतर क्यों हुआ।
जनता को फोटो खिंचवाने वाला समाधान दिवस नहीं, अपनी शिकायत का नंबर, कार्रवाई और अंतिम परिणाम चाहिए।
अब देखने वाली बात यह है कि अमेठी प्रशासन इन आंकड़ों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करता है या फिर ‘28 शिकायतों’ का आंकड़ा ही समाधान दिवस की पूरी कहानी मान लिया जाएगा?
📌 सवाल सीधा है—समाधान दिवस में शिकायतें गिनी जा रही हैं या वास्तव में समस्याओं का समाधान भी हो रहा है?