Crime
आज ही, 27 अक्टूबर 1947 की सुबह भारतीय सेना के सामने एक बड़ी चुनौती थी। पाकिस्तान से आए कबायली हमलावर बारामूला
आज ही, 27 अक्टूबर 1947 की सुबह भारतीय सेना के सामने एक बड़ी चुनौती थी। पाकिस्तान से आए कबायली हमलावर बारामूला
आज ही, 27 अक्टूबर 1947 की सुबह भारतीय सेना के सामने एक बड़ी चुनौती थी। पाकिस्तान से आए कबायली हमलावर बारामूला पर कब्जा कर श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। अगर वे श्रीनगर पहुंच जाते, तो वहां का हवाई अड्डा भी उनके कब्जे में जा सकता था। ऐसे नाजुक समय में भारतीय सेना की पहली बटालियन '1 सिख' को दिल्ली से श्रीनगर भेजा गया। इसकी कमान लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय के हाथों में थी।
श्रीनगर पहुंचते ही उन्होंने दुश्मन को शहर से दूर रोकने का फैसला किया। उनके पास सैनिक कम थे, लेकिन जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मोर्चा संभाला और हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की। इसी अभियान में 27 अक्टूबर 1947 को वह शहीद हो गए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया। यह स्वतंत्र भारत का पहला महावीर चक्र था।
श्रीनगर पहुंचते ही उन्होंने दुश्मन को शहर से दूर रोकने का फैसला किया। उनके पास सैनिक कम थे, लेकिन जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मोर्चा संभाला और हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की। इसी अभियान में 27 अक्टूबर 1947 को वह शहीद हो गए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया। यह स्वतंत्र भारत का पहला महावीर चक्र था।