🔥 TRENDING Chhattisgarh Women Use Rs 1,000 Monthl... Punjab and Chandigarh schools to adopt... Police Remove Body of Man from Family... Police Seize Body En Route to Jhota Pr... 36 Cattle Rescued in Midnight Raid Alo... फतेहपुर में 14 वर्षीय निखिल और 15 वर्ष...
28 Oct 2026•
ગુજરાતી मराठी ਪੰਜਾਬੀ বাংলা
Defence

50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। पति ने अदालत से बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग

✍️ Reporter: Ajaruddin 🗓 28 Oct 2026, 12:11 PM 👁 7
Share: 💬 WhatsApp 📘 Facebook 𝕏 Post

2013 में पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया था। वर्ष 2023 में पति ने डीएनए टेस्ट के लिए आवेदन दिया। उसने दावा किया कि गर्भधारण से पहले की संबंधित अवधि और

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग खारिज करते हुए पति पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। पति ने अदालत से बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी, ताकि वह साबित कर सके कि बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की वैधता पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त आधार पेश नहीं किए गए। अदालत के मुताबिक, यह कानूनी प्रक्रिया पत्नी को अपमानित करने और उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए शुरू की गई थी।

जस्टिस शमीम अहमद ने पति की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए कहा कि किसी बच्चे की पहचान और निजता के अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता। केवल बेवफाई के आरोप साबित करने के लिए बच्चे को डीएनए टेस्ट से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे को मां के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए एक माध्यम की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

यह मामला 2008 में हुई एक शादी से जुड़ा है। दंपति का एक बेटा है और वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी ने 2013 में पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया था। वर्ष 2023 में पति ने डीएनए टेस्ट के लिए आवेदन दिया। उसने दावा किया कि गर्भधारण से पहले की संबंधित अवधि और पूरी गर्भावस्था के दौरान पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं थे। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने उसकी मांग खारिज कर दी थी।

इसके बाद पति ने मजिस्ट्रेट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि डीएनए टेस्ट से बच्चे के पितृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है। लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि पति ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि संबंधित अवधि में उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि घरेलू हिंसा की कार्यवाही शुरू होने के कई साल बाद डीएनए टेस्ट की मांग की गई और इस देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता की कानूनी धारणा का भी उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पितृत्व विवाद में डीएनए टेस्ट अपने आप में अनिवार्य नहीं है। इसके लिए मजबूत आधार होना जरूरी है और बच्चे के हित, निजता तथा कानूनी अधिकारों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
📲Get App