राजनीति
“2019 की कथित तांत्रिक क्रिया की रिकॉर्डिंग वायरल… चुनाव से एक दिन पहले अमावस्या, क्या फिर उठेंगे वही सवाल?”
2019 की कथित तांत्रिक क्रिया की रिकॉर्डिंग वायरल, अब फिर अमावस्या पर उठे सवाल
2019 के नगर निकाय चुनाव से जुड़ी एक कथित रिकॉर्डिंग इन दिनों चर्चा में है। रिकॉर्डिंग में एक व्यक्ति द्वारा दावा किए जाने की बात सामने आ रही है कि चुनाव जीतने के उद्देश्य से पार्टी के कुछ लोगों के कहने पर वह रात करीब 12:10 बजे उज्जैन से बुलाए गए कथित तांत्रिकों के साथ तांत्रिक क्रिया में बैठा था।
रिकॉर्डिंग में बकरे की बलि, कुछ घरों के सामने नींबू फेंकने और श्मशान से कथित मंत्रित राख लाकर घरों के सामने डालने जैसे दावे भी किए जा रहे हैं।
हालांकि, इस रिकॉर्डिंग की सत्यता, आवाज की पहचान और उसमें किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इन बातों को तथ्य नहीं, बल्कि रिकॉर्डिंग में किए गए कथित दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लेकिन अब इसी संदर्भ में एक और सवाल चर्चा में है—इस चुनाव से ठीक एक दिन पहले अमावस्या है।
तो क्या 2019 में सामने आए कथित अंधविश्वास वाले दावों के बाद इस बार भी ऐसी किसी गतिविधि की आशंका है?
हम किसी व्यक्ति या पार्टी पर कोई आरोप नहीं लगा रहे। हमारा सवाल केवल इतना है कि लोकतंत्र में चुनाव जनता के वोट और विश्वास से जीता जाना चाहिए, किसी अंधविश्वास या कथित तांत्रिक प्रक्रिया के सहारे नहीं।
अगर किसी को किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिलती है, तो अफवाह फैलाने के बजाय प्रशासन को सूचना देकर निष्पक्ष जांच की मांग करनी चाहिए।
सवाल जनता से—
क्या चुनाव में अब भी अंधविश्वास की कोई जगह होनी चाहिए, या फैसला सिर्फ जनता के वोट से होना चाहिए?
सच सामने आना चाहिए—अफवाह नहीं। लोकतंत्र में जनता का वोट ही सबसे बड़ी शक्ति है।
2019 के नगर निकाय चुनाव से जुड़ी एक कथित रिकॉर्डिंग इन दिनों चर्चा में है। रिकॉर्डिंग में एक व्यक्ति द्वारा दावा किए जाने की बात सामने आ रही है कि चुनाव जीतने के उद्देश्य से पार्टी के कुछ लोगों के कहने पर वह रात करीब 12:10 बजे उज्जैन से बुलाए गए कथित तांत्रिकों के साथ तांत्रिक क्रिया में बैठा था।
रिकॉर्डिंग में बकरे की बलि, कुछ घरों के सामने नींबू फेंकने और श्मशान से कथित मंत्रित राख लाकर घरों के सामने डालने जैसे दावे भी किए जा रहे हैं।
हालांकि, इस रिकॉर्डिंग की सत्यता, आवाज की पहचान और उसमें किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इन बातों को तथ्य नहीं, बल्कि रिकॉर्डिंग में किए गए कथित दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लेकिन अब इसी संदर्भ में एक और सवाल चर्चा में है—इस चुनाव से ठीक एक दिन पहले अमावस्या है।
तो क्या 2019 में सामने आए कथित अंधविश्वास वाले दावों के बाद इस बार भी ऐसी किसी गतिविधि की आशंका है?
हम किसी व्यक्ति या पार्टी पर कोई आरोप नहीं लगा रहे। हमारा सवाल केवल इतना है कि लोकतंत्र में चुनाव जनता के वोट और विश्वास से जीता जाना चाहिए, किसी अंधविश्वास या कथित तांत्रिक प्रक्रिया के सहारे नहीं।
अगर किसी को किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिलती है, तो अफवाह फैलाने के बजाय प्रशासन को सूचना देकर निष्पक्ष जांच की मांग करनी चाहिए।
सवाल जनता से—
क्या चुनाव में अब भी अंधविश्वास की कोई जगह होनी चाहिए, या फैसला सिर्फ जनता के वोट से होना चाहिए?
सच सामने आना चाहिए—अफवाह नहीं। लोकतंत्र में जनता का वोट ही सबसे बड़ी शक्ति है।